नुसरत फतेह अली खान, जिन्हें दुनिया “शहंशाह-ए-कव्वाली” के नाम से जानती है, एक ऐसे गायक थे, जिनकी आवाज ने सूफी संगीत को दुनिया भर में मशहूर किया। उनकी जिंदगी और करियर की कहानी प्रेरणादायक और दिल को छूने वाली है। आज उनकी 28वीं पुण्यतिथि पर जानते हैं कुछ किस्से…

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नुसरत फतेह अली खान
– फोटो : सोशल मीडिया
सादगी और परिवार से भरा बचपन
नुसरत फतेह अली खान का जन्म 13 अक्टूबर 1948 को पाकिस्तान के फैसलाबाद में एक पंजाबी मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनका असली नाम परवेज फतेह अली खान था, लेकिन एक सूफी संत की सलाह पर उनका नाम नुसरत रखा गया, जिसका मतलब है “कामयाबी की राह।” उनके परिवार का ताल्लुक भारत के जालंधर से था, जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान चला गया। उनके पिता उस्ताद फतेह अली खान एक मशहूर कव्वाल थे, लेकिन वे नहीं चाहते थे कि नुसरत कव्वाली गाएं। वे चाहते थे कि नुसरत डॉक्टर बनें, क्योंकि उस समय कव्वालों को समाज में ज्यादा सम्मान नहीं मिलता था।

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नुसरत फतेह अली खान
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चाचा से सीखा तबला बजाना
नुसरत बेहद शर्मीले स्वभाव के थे। उन्होंने चुपके से अपने चाचा से हारमोनियम और तबला बजाना सीखा। एक दिन उनके पिता ने उन्हें तबला बजाते देख लिया और उनकी प्रतिभा को पहचानकर उन्हें कव्वाली की इजाजत दी। 1979 में नुसरत ने अपनी चचेरी बहन नाहिद से शादी की, जिनसे उनकी एक बेटी निदा हुई।

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कव्वाली को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया
नुसरत ने अपने पिता के निधन के बाद 1971 में परिवार की कव्वाली परंपरा को संभाला। उनकी आवाज में जादू था, जिसने पारंपरिक कव्वाली को आधुनिक रूप देकर युवाओं के दिलों में जगह बनाई। उन्होंने कव्वाली को पाकिस्तान से निकालकर विश्व स्तर पर मशहूर किया। उनके 125 से ज्यादा एल्बम रिलीज हुए, जो गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हैं।

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नुसरत की कव्वाली के दीवाने हैं लोग
नुसरत ने न सिर्फ सूफी कव्वाली गाई, बल्कि गजल और फ्यूजन म्यूजिक में भी अपनी छाप छोड़ी। उनके मशहूर गाने जैसे ‘दमादम मस्त कलंदर’, ‘तुम एक गोरखधंधा हो’, ‘छाप तिलक’ और ‘अल्लाह हू’ आज भी लोगों को झूमने पर मजबूर करते हैं। उन्होंने बॉलीवुड में भी काम किया, जैसे फिल्म ‘और प्यार हो गया’ में ‘कोई जाने कोई ना जाने’ और ‘कच्चे धागे’ में ‘इस करम का करूं शुक्र कैसे अदा’ जैसे गाने। उनके गाने उर्दू, पंजाबी, फारसी, ब्रजभाषा और हिंदी में समान जादू बिखेरते थे। 1985 में लंदन के ‘वर्ल्ड ऑफ म्यूजिक’ फेस्टिवल में उनकी प्रस्तुति ने दुनिया को उनका दीवाना बना दिया। 1993 में शिकागो के विंटर फेस्टिवल में उनकी 20 मिनट की कव्वाली ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने ब्रिटिश संगीतकार पीटर गैब्रियल और कनाडाई संगीतकार माइकल ब्रूक जैसे दिग्गजों के साथ भी काम किया। उनकी आवाज हॉलीवुड फिल्मों जैसे ‘द लास्ट टेम्पटेशन ऑफ क्राइस्ट’ और ‘ब्लड डायमंड’ में भी गूंजी।