इमेज स्रोत, Tom Brenner for The Washington Post via Getty Imagesइमेज कैप्शन, कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत पर 50 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाकर अमेरिका अपने ही हितों को चोट पहुंचा रहा है5 मिनट पहलेअमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात पर 50 फ़ीसदी टैरिफ़ लागू हो गए हैं. भारत में कपड़ा, चमड़ा, झींगा, हैंडीक्राफ़्ट और कई अन्य उद्योगों पर इसका असर दिखना शुरू हो गया है.अमेरिका ने भारत के साथ व्यापार घाटे को दुरुस्त करने के लिए 25 फ़ीसदी और रूस से तेल ख़रीदने के पेनल्टी के तौर पर भारत पर 25 फ़ीसदी का टैरिफ़ लगाया है.कुछ उत्पादों को इससे छूट दी गई है, लेकिन अनुमान के मुताबिक़ भारत का अमेरिका को होने वाला 60 फ़ीसदी से अधिक निर्यात इस 50 फ़ीसदी टैरिफ़ से प्रभावित होगा.अमेरिका के अर्थशास्त्री राष्ट्रपति ट्रंप के इस क़दम पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं. कुछ ने इसे दमनकारी बताया है, तो कुछ का कहना है कि ये टैरिफ़ भारत को वैश्विक कारोबार में और बेहतर मौक़े तलाशने के लिए प्रेरित करेगा.कुछ अर्थशास्त्रियों में यह राय भी बन रही है कि अमेरिका को इस टैरिफ़ वॉर से नुक़सान उठाना पड़ सकता है और उसके राष्ट्रीय हित भी प्रभावित हो सकते हैं.’कठोर’ और ‘दमनकारी’ टैरिफ़ इमेज स्रोत, Getty Imagesइमेज कैप्शन, अमेरिकी निवेश फ़र्म जैफ़रीज़ के स्ट्रैटेजिस्ट क्रिस वुड के मुताबिक़ इन टैरिफ़ के पीछे आर्थिक कारणों से ज़्यादा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यक्तिगत नाराज़गी हैइकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़ अमेरिकी निवेश फ़र्म जैफ़रीज़ के स्ट्रैटेजिस्ट क्रिस वुड भारत पर लगाए गए ट्रंप के टैरिफ़ को ‘कठोर’ बताते हैं. वह कहते हैं कि इससे भारत को 55 से 60 अरब डॉलर तक का नुक़सान हो सकता है.क्रिस वुड का कहना है कि भारत में कपड़ा, जूते, ज्वेलरी और हैंडीक्राफ़्ट उद्योग तबाह हो सकते हैं. भारत में टेक्सटाइल, लेदर और हैंडीक्राफ़्ट उद्योग में ज़्यादातर छोटे कारोबारी हैं और इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोगों को रोज़गार मिला हुआ है.उनके मुताबिक़, भारतीय अर्थव्यवस्था के मुश्किल वक़्त में लगाए गए ये टैरिफ़ ख़ास तौर पर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) पर असर डालेंगे.हालांकि, अमेरिका के टैरिफ़ का असर भारत के सर्विस और आईटी उद्योग पर नहीं होगा.क्रिस वुड तर्क देते हैं कि इन टैरिफ़ के पीछे आर्थिक कारणों से ज़्यादा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यक्तिगत नाराज़गी है और इससे दोनों ही देशों को नुक़सान होगा.’अमेरिका पर होगा उल्टा असर’रूस के सरकारी समाचार चैनल आरटी से बात करते हुए अमेरिकी अर्थशास्त्री रिचर्ड वोल्फ़ ने कहा है कि इसका असर उल्टा हो सकता है.उन्होंने कहा कि अगर भारत को अलग-थलग किया गया तो वह ब्रिक्स जैसे दूसरे आर्थिक समूहों के साथ बेहतर कारोबारी संबंध बनाने की दिशा में आगे बढ़ेगा और इससे अमेरिकी प्रभाव कम हो सकता है.रिचर्ड वोल्फ़ का कहना है कि अमेरिका का यह कठोर रवैया भारत को अपने उत्पाद दूसरे बाज़ारों में बेचने के लिए मजबूर करेगा.उन्होंने कहा, “अगर आप ऊंचे टैरिफ़ लगाकर भारत के लिए अमेरिका का बाज़ार बंद करेंगे तो भारत को अपने उत्पाद बेचने के लिए दूसरे बाज़ार खोजने पड़ेंगे. भारत अपना निर्यात अमेरिका को नहीं करेगा बल्कि ब्रिक्स के सदस्य देशों को करेगा.”वोल्फ़ के मुताबिक़, ये टैरिफ़ ब्रिक्स को “पश्चिम के मुक़ाबले का एक बड़ा, अधिक संगठित और मज़बूत आर्थिक विकल्प बना देगा.”उन्होंने कहा, “भारत अब अमेरिका के मुताबिक़ दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है. अमेरिका का भारत को यह बताना कि क्या करना चाहिए, वैसा ही है जैसे कोई चूहा हाथी को मुक्का मारे.”‘अमेरिका ने मारी अपने पैर पर कुल्हाड़ी’इमेज स्रोत, Getty Imagesइमेज कैप्शन, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुरुआत में भारत पर 25 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाया था, लेकिन बाद में इसे और बढ़ा दिया रिचर्ड वोल्फ़ ने कहा कि मौजूदा समय में इस आर्थिक तनाव को देखना एक ऐतिहासिक पल का गवाह होने जैसा है.उनका कहना है कि अमेरिका इन टैरिफ़ के ज़रिए अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार रहा है.रिचर्ड वोल्फ़ ने कहा कि भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और वो अमेरिकी दबाव के आगे झुकेगा नहीं, बल्कि अपने निर्यात कारोबार को और बढ़ाएगा.अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुरुआत में भारत पर 25 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाया था. उस समय दोनों देशों के बीच ट्रेड डील को लेकर बातचीत चल रही थी. लेकिन बाद में ट्रंप ने अप्रत्याशित रूप से भारत को निशाना बनाते हुए 25 फ़ीसदी अतिरिक्त टैरिफ़ और लगा दिया. यह रूस से कच्चा तेल ख़रीदने के दंड के रूप में लगाया गया.दरअसल, यूक्रेन युद्ध से पहले भारत रूस से अपनी ज़रूरत का दो फ़ीसदी से भी कम कच्चा तेल ख़रीदता था. लेकिन रूस भारत को छूट के साथ कच्चा तेल बेच रहा है और भारत अपने राष्ट्रीय हितों का हवाला देकर अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद इस कच्चे तेल की ख़रीद जारी रखे हुए है.रूस के तेल से भारत का मुनाफ़ाइमेज स्रोत, Press Information Bureau (PIB)/Anadolu via Getty Imagesइमेज कैप्शन, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 9 जुलाई, 2024 को रूस में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की थीभारत फिलहाल 35 फ़ीसदी से अधिक कच्चा तेल रूस से ख़रीद रहा है. लेकिन भारत यह कच्चा तेल सिर्फ़ अपनी घरेलू ज़रूरतें पूरी करने के लिए ही नहीं, बल्कि निर्यात के लिए भी ख़रीद रहा है.इस कच्चे तेल को रिफ़ाइन करके यूरोप, अफ़्रीका और एशिया के कई देशों में बेचा जा रहा है. भारत इससे मुनाफ़ा कमा रहा है.ऐसे में, अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत को सख़्त संदेश देने के लिए भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त 25 फ़ीसदी टैरिफ़ लगा दिया है.भारतीय कारोबारियों पर इस टैरिफ़ के असर के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि उनका देश अपने छोटे कारोबारियों, उद्योगों और किसानों को इसके के प्रभाव से बचाने के लिए क़दम उठाने जा रहा है.इसी बीच, भारत ने ब्रिटेन, जापान और दक्षिण कोरिया समेत 40 अन्य देशों के साथ कारोबारी संबंध बेहतर करने की दिशा में विशेष संपर्क कार्यक्रम भी शुरू किया है.चीन के क़रीब जा सकता है भारत?विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका की भारत को राजनयिक और आर्थिक रूप से दंडित करने की नीति उसे चीन के क़रीब भी ला सकती है. यह वही स्थिति होगी जिससे बचने की कोशिश अमेरिकी विदेशी नीतिकार लंबे समय से करते रहे हैं.भारत में चीन से आयात बढ़ रहा है और दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें फिर से शुरू होने जा रही हैं. ऐसे में अमेरिकी टैरिफ़ भारत और चीन को तकनीकी और कारोबारी क्षेत्र में सहयोग की ओर प्रेरित कर सकते हैं. क्रिस वुड का कहना है, “टैरिफ़ वॉर भारत को चीन के क़रीब ले जा सकता है. सितंबर में पांच साल बाद दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें शुरू हो रही हैं. भारत का चीन से सालाना आयात 118 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है और यह हर साल 13 फ़ीसदी की दर से बढ़ रहा है. भारत को चीन के सोलर पैनल जैसे सस्ते सामानों की ज़रूरत है.”क्रिस वुड का कहना है कि अगर भारत चीन की तरफ़ बढ़ता है तो यह अमेरिका के राष्ट्रीय हित में नहीं होगा.बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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