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‘फ़ैक्ट्री बंद हुई तो बच्चों की पढ़ाई भी रुक जाएगी’ ट्रंप के टैरिफ़ का भारतीय लेदर इंडस्ट्री पर कितना असर?



इमेज कैप्शन, इस उद्योग से लाखों लोगों का रोज़गार जुड़ा हुआ है. ….मेंAuthor, सैयद मोज़िज इमामपदनाम, बीबीसी संवाददाता27 अगस्त 2025, 10:32 ISTअपडेटेड एक मिनट पहलेउत्तर प्रदेश के कानपुर-उन्नाव लेदर क्लस्टर में इन दिनों अमेरिका के टैरिफ़ की चर्चा तेज़ है.जब से अमेरिका ने भारत पर कुल टैरिफ़ 50 प्रतिशत करने की घोषणा की है, तब से इस इलाक़े में चिंता बढ़ गई है.एक तरफ़ व्यापारियों को इस टैरिफ़ की वजह से नुक़सान की चिंता है, तो दूसरी तरफ़ चमड़ा उद्योग में काम करने वाले मज़दूर अपनी रोज़ी-रोटी को लेकर परेशान हैं.कानपुर से तक़रीबन दो हज़ार करोड़ रुपये का चमड़े का व्यापार अमेरिका के साथ होता है.बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करेंकाउंसिल फ़ॉर लेदर एक्सपोर्ट्स के मुताबिक़, भारतीय चमड़े के उत्पाद का उद्योग देश की अर्थव्यवस्था में अहम जगह रखता है.साल 2022-23 में भारत ने अमेरिका को 1.17 अरब डॉलर के चमड़ा उत्पाद निर्यात किए थे.ये 2023-24 में घटकर क़रीब 89 करोड़ डॉलर रह गए. यानी दो साल में तक़रीबन 23 प्रतिशत की गिरावट आई है.कानपुर-उन्नाव लेदर क्लस्टर का महत्वइमेज कैप्शन, कानपुर के चमड़ा उद्योग पर अमेरिकी टैरिफ़ का असर दिखने लगा हैभारत से अमेरिका को होने वाले लेदर निर्यात का 20 प्रतिशत हिस्सा उत्तर प्रदेश के कानपुर-उन्नाव क्लस्टर से आता है.कानपुर-उन्नाव देश में चमड़े के उत्पादन और निर्यात का अहम केंद्र माना जाता है.यहां की टैनरीज़ और लेदर फ़ैक्ट्रियां न सिर्फ़ घरेलू बाज़ार बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान रखती हैं.अमेरिका इस क्लस्टर का सबसे बड़ा ख़रीदार है, लेकिन टैरिफ़ बढ़ने के बाद इस उद्योग के सामने गहरा संकट खड़ा हो गया है.निर्यातक ऑर्डर रुकने से परेशान हैं और फ़ैक्ट्रियों में काम करने वाले हज़ारों मज़दूरों की चिंताएं भी बढ़ती जा रही हैं.कानपुर और उन्नाव का लेदर क्लस्टर दशकों से भारत के निर्यात की रीढ़ रहा है. यहां से न सिर्फ़ तैयार लेदर बल्कि फुटवियर, बेल्ट, बैग, जैकेट और सैडलरी जैसे उत्पाद विदेश भेजे जाते हैं.काउंसिल फ़ॉर लेदर एक्सपोर्ट्स का दावा है कि यहां क़रीब 400 टैनरीज़ हैं, जहां कच्चे चमड़े को प्रोसेस करके इस्तेमाल के लायक बनाया जाता है. इसके अलावा 400 से 500 लेदर गुड्स यूनिट्स हैं.अनुमान है कि इस उद्योग से क़रीब एक लाख लोग सीधे और पांच लाख लोग परोक्ष तौर पर जुड़े हैं.अमेरिकी टैरिफ़ का असरइमेज कैप्शन, कारोबारी फरहा फ़ातिमा के मुताबिक़ अमेरिकी ग्राहकों ने कई ऑर्डर रोक दिए हैं लेदर उत्पादों पर पहले से ही 25 प्रतिशत ड्यूटी लागू थी, जिसे अब 50 प्रतिशत कर दिया गया है. निर्यातकों का कहना है कि यह बढ़ोतरी उनके लिए असहनीय है.उनके मुताबिक पहले से ही डॉलर की दर और कच्चे माल की बढ़ी क़ीमतों ने मुनाफ़े का मार्जिन घटा दिया है. अब अगर अमेरिकी ग्राहक 50 प्रतिशत अतिरिक्त क़ीमत चुकाने को तैयार नहीं होंगे तो ऑर्डर अपने आप रुक जाएंगे.कानपुर की उद्यमी फरहा फ़ातिमा बताती हैं कि अमेरिकी ग्राहकों ने कई ऑर्डर रोक दिए हैं.उनका कहना है, “हमारी इंडस्ट्री बहुत कम मार्जिन पर चलती है. कस्टमर्स चाहते हैं कि हम दाम न बढ़ाएं, लेकिन 25 प्रतिशत ड्यूटी पहले ही लागू है. 50 प्रतिशत होने के बाद फ़ैक्ट्रियां बंद होने का ख़तरा है.”काउंसिल फ़ॉर लेदर एक्सपोर्ट्स का भी कहना है कि यह स्थिति लंबे समय तक नहीं चल सकती.काउंसिल ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर चिंता जताई है कि अगर अमेरिका का बाज़ार बंद हुआ तो न सिर्फ़ व्यापार गिरेगा बल्कि रोज़गार पर भी बड़ा असर पड़ेगा.काउंसिल फ़ॉर लेदर एक्सपोर्ट्स के क्षेत्रीय चेयरमैन असद इराक़ी कहते हैं, “अमेरिका हमारा सबसे बड़ा ख़रीदार है. अब अगर वे 50 प्रतिशत टैरिफ़ लगा रहे हैं, तो यह बिल्कुल असहनीय है. यह काम कर ही नहीं सकता. जब 25 प्रतिशत लगाया गया था, तब हम विकल्प ढूंढ रहे थे.”उनके मुताबिक़, “इंडस्ट्री और भारत सरकार की मदद से हम ग्राहकों से पूछ पा रहे थे कि वो कितना बोझ उठा सकते हैं. लेकिन 50 प्रतिशत शुल्क बिल्कुल भी संभव नहीं है, इससे तो यह बिज़नेस तबाह हो जाएगा.”निर्यातकों का कहना है कि अगर सरकार वैकल्पिक बाज़ार खोजने और निर्यातकों को राहत पैकेज देने में मदद करे, तो उद्योग को संभाला जा सकता है.लेदर इंडस्ट्री पर असरबिज़नेस स्टैंडर्ड के लखनऊ स्थित वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलाहंस कहते हैं, “अमेरिका को जाने वाले आइटम्स में सैडलरी (काठी), जैकेट, जूते और दूसरी चीज़ें शामिल हैं. ख़ास तौर पर क्रिसमस के टाइम में मांग बढ़ती है—क्रिसमस, न्यू ईयर से लेकर ईस्टर तक कारोबार का एक बड़ा सीज़न होता है.”कलाहंस के मुताबिक़, “ऐसी ख़बर है कि क़रीब 100 करोड़ रुपये के ऑर्डर अकेले कानपुर में प्रभावित हुए हैं.”विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को अब रूस, यूरोप और मध्य एशियाई देशों पर ध्यान देना होगा. अगर अमेरिका का मार्केट कम हुआ तो इन क्षेत्रों में नए अवसर तलाशने होंगे.उनका कहना है कि पहले से ही भारत को पाकिस्तान और बांग्लादेश के चमड़ा उद्योग से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है. पाकिस्तान पर 19 प्रतिशत और बांग्लादेश पर 20 प्रतिशत ही टैरिफ़ है.मज़दूरों की रोज़ी-रोटी पर असरइमेज कैप्शन, कानपुर के चमड़ा उद्योग में बड़ी संख्या में मज़दूर काम करते हैंटैरिफ़ का असर सिर्फ़ निर्यातकों तक सीमित नहीं है. इससे फ़ैक्ट्रियों में काम करने वाले लाखों मज़दूरों की रोज़ी-रोटी भी दांव पर है.लक्ष्मी, उन्नाव ज़िले के चिलौला गांव की रहने वाली हैं. वो रोज़ाना 10 किलोमीटर दूर से अपने पति श्रवण कुमार के साथ एक लेदर यूनिट में काम करने आती हैं.इनके छह बच्चे हैं, जिनमें चार स्कूल जाते हैं.लक्ष्मी कहती हैं, “मैं और मेरे पति दोनों मशीन चलाते हैं. रोज़ 8-10 घंटे काम करके घर चलता है. अगर फ़ैक्ट्री बंद हो गई तो हमें मज़दूरी करनी पड़ेगी. बच्चों की पढ़ाई भी रुक जाएगी.”इसी तरह, उन्नाव के सचिन कुमार कहते हैं, “अगर टैनरी (चमड़े का कारख़ाना) बंद हुई तो हम बेरोज़गार हो जाएंगे. घर का गुज़ारा इसी काम से चलता है. दूसरे काम में इतनी कमाई नहीं होगी.”सचिन साल 2014 से इस काम में हैं. उन्हें भी अमेरिका के टैरिफ़ के बारे में मालूम है.वो बताते हैं, “अमेरिका के ट्रंप जी ने 50 प्रतिशत टैरिफ़ लगा दिया है. अगर उस वजह से हमारी टैनरी बंद हो जाएगी तो हम लोगों पर बहुत असर पड़ेगा.”लेदर सेक्टर स्किल काउंसिल, चेन्नई के चेयरमैन और स्थानीय निर्यातक मुख़्तारुल अमीन कहते हैं, “ये बड़ी लेबर इंटेंसिव इंडस्ट्री है. इस एक इंडस्ट्री में कई प्रोडक्ट बनते हैं. उस प्रक्रिया में लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोज़गार मिलता है.”अमीन बताते हैं कि लेदर उद्योग रोज़गार देने वाली सबसे बड़ी इंडस्ट्री है.उनका कहना है, “तक़रीबन पांच लाख लोग इस इंडस्ट्री से रोज़गार पा रहे हैं.”नए बाज़ारों की तलाशइमेज कैप्शन, मुख़्तारुल अमीन के मुताबिक़ कुछ कारोबारी अब ब्रिटेन के साथ हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से उम्मीद लगा रहे हैंभारत के निर्यातक अब दूसरे देशों की ओर रुख़ कर रहे हैं. कई निर्यातक ब्रिटेन के साथ फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफ़टीए) से उम्मीद लगाए हैं, लेकिन इसमें अभी वक़्त लग सकता है.मुख़्तारुल अमीन कहते हैं, “ब्रिटेन के साथ जो एफ़टीए हुआ है, वहाँ से हम काफ़ी उम्मीद कर रहे हैं कि हमारा व्यापार बढ़ेगा और शायद दोगुना भी हो जाए. क्योंकि अभी तक हमारा मुक़ाबला ऐसे देशों के साथ था जिनको ड्यूटी-फ़्री एक्सेस था.”जुलाई महीने में भारत और ब्रिटेन के बीच बीते तीन साल से रुक-रुक कर चले एफ़टीए यानी मुक्त व्यापार समझौते पर मुहर लगी थी.बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित



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