अमर उजाला डिजिटल से एक लंबी बातचीत में पल्लवी जोशी ने फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ की रिलीज में खड़ी हो रही है मुश्किलों पर बात की। वह चाहती हैं कि इस फिल्म को हर बंगाली व्यक्ति देखे। साथ ही पल्लवी अपनी जिंदगी के एक मुश्किल वक्त का जिक्र भी करती हैं, इस दौर में उन्होंने खुद को कैसे संभाला जानिए? 

पल्लवी बोलीं- कोशिश करेंगे कि बंगाल में यह फिल्म रिलीज हो


फिल्म ‘बंगाल फाइल्स’ पूरे देश में रिलीज हो रही है लेकिन बंगाल में इसके रुकने की आशंका है। ऐसे में पल्लवी शांति और सम्मान से बंगाल के लोगों से अपील करना चाहती हैं। वह कहती हैं, ‘हम तो पूरी कोशिश करेंगे कि बंगाल में भी यह फिल्म रिलीज हो। हमारी दिली इच्छा है कि हर बंगाली इस फिल्म को देखे। जैसे ‘कश्मीर फाइल्स’ सिर्फ कश्मीरियों की फिल्म नहीं थी, वह पूरे भारत की फिल्म थी, क्योंकि कश्मीरी भी भारतीय हैं। वैसे ही बंगाली भी हमारे ही भाई-बहन हैं। वह और हम अलग नहीं हैं। जो फिल्म हमने बनाई है, वह सिर्फ बंगालियों की नहीं, सबकी ही त्रासदी पर आधारित है। 1940 के दशक की घटनाएं और आज जो वहां की स्थिति है, जैसे इल्लीगल इमिग्रेशन और लोगों की पीड़ा, वही इसमें दिखाया गया है। हमारी पूरी कोशिश है कि यह फिल्म बंगाल में पहुंचे।’  

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जब पल्लवी जोशी ने साल 2007 में देखा मुश्किल दौर 

पल्लवी जोशी की करियर जर्नी काफी इंस्पायरिंग रही है लेकिन उन्होंने भी अपने करियर में मुश्किल दौर देखा है। वह बताती हैं, ‘2006-07 के बाद मुझे कोई ऑफर नहीं मिला। क्यों ऐसा हुआ, यह आज तक नहीं जानती? शुक्र है कि मैंने उससे पहले प्रोडक्शन का काम शुरू कर दिया था। मराठी शोज बनाने लगी थी। इस तरह मैं व्यस्त रही, वरना सच कहूं तो काम न मिलने से इंसान परेशान हो जाता है। मेरे बच्चे भी बड़े हो गए थे, उन्हें मेरी उतनी जरूरत नहीं थी। उस खालीपन में प्रोडक्शन के काम ने मुझे बचाया। कभी-कभी रुकावटें भी अच्छे के लिए होती हैं।’ 

किरदारों का चयन कैसे करती हैं पल्लवी? 


पल्लवी जोशी की पिछली फिल्म ‘कश्मीर फाइल्स’ को नेशनल अवॉर्ड मिला। यह बात उनके फिल्मों के चयन को प्रभावित नहीं कर सकी है। वह कहती हैं, ‘प्रेशर मेरे ऊपर नहीं है। लोग बहुत प्यार करते हैं, यहां तक कि अमेरिका में भी स्क्रीनिंग के दौरान कई लोग कह रहे थे कि पल्लवी, तुम्हें फिर नेशनल अवॉर्ड मिलना चाहिए। मैं इसे प्रेशर नहीं बल्कि उनका प्यार मानती हूं। मेरा मानना है कि असल कॉम्पिटिशन तो अपने आप से होता है। आप हमेशा चाहते हैं कि पिछले काम से बेहतर करें। दो साल बाद आपकी उम्र और अनुभव भी बढ़ जाता है, तो स्वाभाविक है कि किरदार भी ज्यादा मैच्योर निभाने पड़ते हैं। मैंने कभी यह सोचकर रोल नहीं चुने कि अवॉर्ड मिलेगा। बस इतना चाहती हूं कि अपने पिछले काम से एक कदम आगे जाऊं।’ 



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