इमेज स्रोत, Getty Imagesइमेज कैप्शन, रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर चुके संक्रमणों की वजह से दुनियाभर में हर साल दस लाख से ज़्यादा लोगों की मौत हो रही है….मेंAuthor, जेम्स गैलेघरपदनाम, स्वास्थ्य और विज्ञान संवाददाता16 अगस्त 2025आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस यानी एआई ने ऐसी दो नई एंटीबायोटिक दवाएं विकसित की हैं जो रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर चुकी गोनोरिया और एमआरएसए सुपरबग को ख़त्म कर सकती हैं.शोधकर्ताओं के मुताबिक़ एआई ने इन दवाओं को डिज़ाइन किया है और प्रयोगशाला के साथ ही जानवरों पर किए गए परीक्षणों में यह इन सुपरबग्स को मारने में सफल रही हैं.इन दोनों कम्पाउंड को अभी कई साल तक रिफ़ाइन किया जाएगा और इनका लगातार परीक्षण भी होगा. उसके बाद ही इनका प्रिस्क्रिप्शन के तौर पर यानी आम लोगों द्वारा इस्तेमाल किया जा सकेगा.लेकिन इसके पीछे काम कर रही मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) की टीम का कहना है कि एआई एंटीबायोटिक की खोज में “दूसरा स्वर्ण युग” शुरू कर सकता है.बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करेंप्रतिरोधी क्षमता विकसित कर चुके संक्रमण का इलाजएंटीबायोटिक, बैक्टीरिया को मारते हैं. लेकिन अब एंटीबायोटिक दवाओं को लेकर प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर चुके संक्रमण (बैक्टीरिया) की वजह से हर साल दस लाख से ज़्यादा लोगों की मौत हो रही है.जानकार यह मानते हैं कि एंटीबायोटिक के अत्यधिक इस्तेमाल की वजह से बैक्टीरिया को दवाओं के असर से बचने के लिए ख़ुद को बदल लेने में मदद मिली है.पिछले कई दशकों से नए एंटीबायोटिक की कमी बनी हुई है. इससे पहले शोधकर्ता हज़ारों उपलब्ध केमिकल को खंगालने के लिए एआई का इस्तेमाल कर चुके हैं, ताकि ऐसे केमिकल कम्पाउंड खोजे जा सकें जिनके नए एंटीबायोटिक में बदलने की क्षमता हो.अब एमआईटी की टीम ने इस दिशा में एक क़दम और आगे बढ़ाते हुए एंटीबायोटिक डिज़ाइन करने के लिए जनरेटिव एआई का इस्तेमाल किया है.यह एंटीबायोटिक शुरू में सेक्सुअली ट्रांसमिट होने वाली बीमारी गोनोरिया और जानलेवा होने की हद तक ख़तरनाक मेथिसिलिन-रेज़िस्टेंट स्टैफ़िलोकॉकस ऑरियस यानी एमआरएसए के लिए बनाए गए हैं.शोधकर्ताओं का अध्ययन ‘सेल’ नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ है. इस शोध में 3.6 करोड़ कम्पाउंड की जांच की गई, जिनमें कई ऐसे भी थे जो या तो अब तक मौजूद नहीं हैं या अब तक उनकी खोज नहीं हुई है.प्रयोगशाला और चूहों पर परीक्षण में रहा सफलइमेज स्रोत, Getty Imagesइमेज कैप्शन, एंटीबायोटिक के अत्यधिक इस्तेमाल से बैक्टीरिया को दवाओं के असर से बचने के लिए ख़ुद को बदल लेने में मदद मिली हैवैज्ञानिकों ने एआई को ट्रेनिंग देने के लिए उसे मौजूदा समय में उपलब्ध कम्पाउंड की रासायनिक संरचना और उससे संबंधित डेटा दिया ताकि वे जान सकें कि ये कम्पाउंड अलग-अलग प्रजातियों के बैक्टीरिया के बढ़ने की गति को धीमा करते हैं या नहीं.इसके बाद एआई ने यह देखा कि कार्बन, ऑक्सीजन, हाइड्रोजन और नाइट्रोजन जैसे परमाणुओं से बने अलग-अलग मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर बैक्टीरिया पर क्या असर डालते हैं.इसके बाद एआई से नए एंटीबायोटिक डिज़ाइन करने के लिए दो तरीक़ों को अपनाया गया. पहले तरीक़े में एंटीबायोटिक डिज़ाइन करने का एक शुरुआती बिंदु तय करने के लिए आठ से 19 परमाणुओं के आकार वाले लाखों रासायनिक टुकड़ों की लाइब्रेरी में खोज की गई और वहीं से आगे डिज़ाइन तैयार किया गया.इसके दूसरे तरीक़े में एआई को शुरू से ही पूरी आज़ादी दी गई.इस डिज़ाइन प्रक्रिया में ऐसे कम्पाउंड को बाहर कर दिया गया जो मौजूदा एंटीबायोटिक से बहुत मिलते-जुलते थे.इसमें यह भी सुनिश्चित किया गया कि एआई दवा बना रहा है, न कि कोई और चीज़. इसलिए ऐसे कम्पाउंड्स को भी हटा दिया गया जो इंसानों के लिए ज़हरीले हो सकते थे.वैज्ञानिकों ने गोनोरिया और एमआरएसए के लिए एंटीबायोटिक बनाने में एआई का इस्तेमाल किया. ये दोनों एक प्रकार के बैक्टीरिया हैं और आमतौर पर त्वचा पर मौजूद होते हैं. हालांकि इनसे कोई नुक़सान नहीं होता है, लेकिन शरीर के अंदर पहुंचने पर यह गंभीर संक्रमण का कारण बन सकते हैं.दवाओं के बनने के बाद, इसके सबसे उपयुक्त डिज़ाइनों का परीक्षण प्रयोगशाला में बैक्टीरिया पर और संक्रमित चूहों पर किया गया. बाद में इससे दो नए संभावित एंटीबायोटिक तैयार किए गए.इंसानों पर परीक्षण के लिए करना होगा इंतज़ारइमेज स्रोत, MITइमेज कैप्शन, एमआईटी के प्रोफ़ेसर जेम्स कॉलिन्स अब तक के नतीजों से काफ़ी उत्साहित हैंएमआईटी के प्रोफ़ेसर जेम्स कॉलिन्स ने बीबीसी को बताया, “हम इससे उत्साहित हैं क्योंकि हम दिखा रहे हैं कि जनरेटिव एआई का इस्तेमाल करके पूरी तरह नए एंटीबायोटिक डिज़ाइन किए जा सकते हैं.””एआई हमें सस्ते और तेज़ गति से मॉलिक्यूल खोजने में मदद कर सकता है और इस तरह हमारे पास दवाओं का भंडार बढ़ सकता है. यह हमें सुपरबग के जीन के ख़िलाफ़ इस जंग में बढ़त दिला सकता है.”हालांकि, ये दवाएं अभी आम परीक्षण के लिए तैयार नहीं हैं. पहले इन्हें और रिफ़ाइन किया जाएगा, जिसमें दो साल का वक़्त लग सकता है. इसके बाद ही इनकी इंसानों पर परीक्षण की लंबी प्रक्रिया शुरू की जा सकेगी.फ्लेमिंग इनिशिएटिव और इम्पीरियल कॉलेज लंदन के डॉक्टर एंड्रयू एडवर्ड्स ने कहा कि यह काम “बहुत ख़ास” है और इसमें “बेहद ज़्यादा संभावनाएं” हैं क्योंकि यह “नए एंटीबायोटिक खोजने का एक नया तरीक़ा पेश करता है.”हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि, “एआई दवाओं की खोज और विकास में बड़ा सुधार कर सकता है, लेकिन हमें सुरक्षित और प्रभावशाली परीक्षण के मामले में अभी भी कड़ी मेहनत करनी होगी.”यह एक लंबी और महंगी प्रक्रिया हो सकती है, और इस बात की कोई गारंटी भी नहीं है कि आख़िर में ये दवाएं मरीज़ों को दी जा सकेंगी.इमेज स्रोत, Getty Imagesइमेज कैप्शन, कुछ विशेषज्ञ एआई की मदद से दवा की खोज में व्यापक स्तर पर सुधार की मांग कर रहे हैं (सांकेतिक तस्वीर)आर्थिक चुनौतियाँकुछ विशेषज्ञ एआई की मदद से दवा की खोज में व्यापक स्तर पर सुधार की मांग कर रहे हैं.प्रोफ़ेसर कॉलिन्स का कहना है, “हमें बेहतर मॉडल की ज़रूरत है, जो केवल इस बात पर आधारित हों कि दवाएं प्रयोगशाला में कितनी कारगर हैं, और ऐसे मॉडल बनें जो शरीर में उनके असर का बेहतर अनुमान लगा सकें.”एआई से डिज़ाइन की गई दवाओं के निर्माण में भी चुनौती है. गोनोरिया के लिए सैद्धांतिक रूप से डिज़ाइन किए गए सबसे बेहतर 80 इलाज में से केवल दो को दवाओं के रूप में तैयार किया जा सका है.यूनिवर्सिटी ऑफ़ वॉरिक के प्रोफ़ेसर क्रिस डॉसन ने इस अध्ययन को “अच्छा” बताया और कहा कि यह एआई को एंटीबायोटिक की खोज के एक ज़रिए के रूप में आगे बढ़ाने की दिशा में एक ख़ास क़दम है.उनका यह भी कहना है कि यह दवाओं को लेकर प्रतिरोधी क्षमता विकसित होने के ख़तरे को कम करने के लिहाज़ से भी एक “महत्वपूर्ण क़दम” है.हालांकि, उन्होंने यह भी बताया कि दवा-प्रतिरोधी संक्रमणों में एक आर्थिक समस्या भी है- “आप ऐसी दवाएं कैसे बनाएंगे जिनका कोई व्यावसायिक मूल्य न हो?”अगर कोई नया एंटीबायोटिक बनाया जाए, तो सबसे बेहतर यही है कि उसका जितना कम इस्तेमाल होगा, उतना ही उसका असर बना रहेगा. कम इस्तेमाल होने का मतलब है कि कम बिक्री और इससे किसी का भी मुनाफ़ा कमाना मुश्किल ही होगा.बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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