इमेज स्रोत, Salman Ali/Hindustan Times via Getty Images5 अगस्त 2025जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का मंगलवार को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया.सत्यपाल मलिक के एक्स अकाउंट पर उनके निधन की जानकारी दी गई है.सत्यपाल मलिक के निजी सचिव केएस राणा ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में इसकी पुष्टि की है. उन्होंने बताया, ”सत्यपाल मलिक का निधन आज दोपहर 1 बजकर 12 मिनट पर राम मनोहर लोहिया अस्पताल में हो गया.”सत्यपाल मलिक जम्मू-कश्मीर के अलावा बिहार, गोवा और मेघालय के राज्यपाल रहे थे.सत्यपाल मलिक ख़ुद को लोहियावादी बताते थे. लोहिया के समाजवाद से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी सियासी पारी छात्र नेता के रूप में मेरठ कॉलेज छात्रसंघ से शुरू की.सत्यपाल मलिक का जन्म उत्तर प्रदेश में बागपत के हिसावदा गांव में 24 जुलाई 1946 को हुआ. सत्यपाल जब दो साल के थे तभी उनके पिता का निधन हो गया था.बीबीसी से बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री ने बताया कि सत्यपाल मलिक को राजनीति में चौधरी चरण सिंह लेकर आए थे.1974 में उन्होंने चौधरी चरण सिंह की पार्टी भारतीय क्रांति दल के टिकट पर बागपत विधानसभा का चुनाव लड़ा और महज़ 28 साल की उम्र में विधानसभा पहुंच गए.पहला विधानसभा चुनाव सत्यपाल मलिक ने क़रीब दस हजार वोटों के अंतर से जीता था.1980 में लोकदल पार्टी से राज्यसभा पहुंचे, लेकिन चार साल बाद ही उन्होंने उस कांग्रेस का दामन थाम लिया जिसके शासनकाल में लगी इमरजेंसी का विरोध करने पर वो जेल गए थे.1987 में राजीव गांधी पर बोफ़ोर्स घोटाले का आरोप लगा, जिसके ख़िलाफ़ विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मोर्चा खोल दिया था और इसमें सत्यपाल मलिक ने उनका साथ दिया. कांग्रेस को छोड़कर सत्यपाल मलिक ने जन मोर्चा पार्टी बनाई जो साल 1988 में जनता दल में मिल गई.1989 के आम चुनावों में सत्यपाल मलिक ने यूपी की अलीगढ़ सीट से चुनाव लड़ा और पहली बार लोकसभा पहुंचे.1996 में उन्होंने समाजवादी पार्टी ज्वाइन की और अलीगढ़ से चुनाव लड़ा. अलीगढ़ में उनकी बुरी हार हुई. वे चौथे नंबर पर रहे. उन्हें क़रीब 40 हज़ार वोट पड़े, जबकि जीतने वाले उम्मीदवार को क़रीब दो लाख तीस हज़ार वोट पड़े थे. इस चुनाव के परिणाम से उनकी जाट नेता वाली छवि पर भी असर पड़ा था.अपने सियासी सफ़र में सत्यपाल मलिक क़रीब तीस साल तक समाजवादी विचारधारा से जुड़े रहे, लेकिन 2004 में वे बीजेपी में शामिल हुए और पार्टी के टिकट पर चौधरी चरण सिंह के बेटे अजित सिंह के ख़िलाफ़ बागपत से चुनाव लड़े.यह चुनाव भी उनकी जाट नेता की अस्मिता के लिए एक परीक्षा की तरह था, लेकिन इसमें वे फ़ेल साबित हुए. अजित सिंह को क़रीब तीन लाख पचास हजार वोट पड़े तो तीसरे नंबर पर रहे सत्यपाल मलिक को क़रीब एक लाख वोट मिले.2005-2006 में उन्हें उत्तर प्रदेश बीजेपी का उपाध्यक्ष, 2009 में भारतीय जनता पार्टी के किसान मोर्चा का राष्ट्रीय प्रभारी बनाया गया.Play video, “पुलवामा हमले, भाजपा और केजरीवाल की ‘गिरफ़्तारी’ पर क्या बोले सत्यपाल मलिक?”, अवधि 11,4811:48वीडियो कैप्शन, पुलवामा हमले, भाजपा और केजरीवाल की ‘गिरफ़्तारी’ पर क्या बोले सत्यपाल मलिक?हेमंत अत्री ने बीबीसी को बताया था, “हार के बावजूद बीजेपी ने सत्यपाल मलिक को अपने साथ रखा. 2012 में उन्हें बीजेपी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया. ये वो दौर था जब बीजेपी उत्तर प्रदेश में अपनी ज़मीन तलाश रही थी और उसे एक जाट लीडर की तलाश थी.””उसी समय सत्यपाल मलिक का नरेंद्र मोदी के साथ व्यक्तिगत संवाद हुआ और संबंध बना.”2014 में बहुमत के साथ नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनकर आए तब सत्यपाल मलिक को 30 सितंबर 2017 को बिहार का राज्यपाल बनाया गया.क़रीब 11 महीने बिहार का राज्यपाल रहने के बाद अगस्त 2018 में उन्हें जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल नियुक्त किया गया.सत्यपाल मलिक के कार्यकाल में ही जम्मू-कश्मीर में विधानसभा भंग हुई, जिसके बाद राज्य का सारा प्रशासन उनके हाथ में आ गया. इसी दौरान पांच अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया.नवंबर 2019 से अगस्त 2020 तक वह गोवा के और अगस्त 2020 से अक्तूबर 2022 तक वह मेघालय के राज्यपाल रहे.सत्यपाल मलिक बनाम पीएम मोदीइमेज स्रोत, FB/SATYAPAL.MALIK.35पिछले कुछ सालों से सत्यपाल मलिक लगातार कई मुद्दों पर मोदी सरकार की आलोचना कर रहे थे, फिर चाहे वह किसान आंदोलन हो या जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना हो.उनके कई बयानों ने ख़ासा विवाद पैदा किया.केंद्र की लापरवाही था पुलवामा हमला: 14 फरवरी 2019 को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में विस्फोटकों से भरी गाड़ी, सीआरपीएफ़ के 70 बसों के काफ़िले में चल रही एक बस से भिड़ा दी गई थी. इस आत्मघाती हमले में 40 जवानों की मौत हुई थी.उन्होंने कहा कि जम्मू से श्रीनगर पहुंचने के लिए सीआरपीएफ़ को पांच एयरक्राफ़्ट की ज़रूरत थी. उन्होंने गृह मंत्रालय से एयरक्राफ़्ट मांगे थे, लेकिन उन्हें नहीं दिए गए. एयरक्राफ़्ट दे देते तो ये हमला नहीं होता क्योंकि इतना बड़ा काफ़िला सड़क से नहीं जाता.सत्यपाल मलिक ने दावा किया था कि जब यह जानकारी उन्होंने प्रधानमंत्री को दी और अपनी ग़लती के बारे में बताया तो पीएम ने कहा, “आप इस पर चुप रहिए.”साल 2023 में एक निजी चैनल के इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, “जब आप सत्ता में हैं तो आत्मा क्यों नहीं जागती. अगर यह सब सच है, तो राज्यपाल रहते हुए वह चुप क्यों थे. ये सार्वजनिक चर्चा के मुद्दे नहीं हैं.”जम्मू-कश्मीर और अनुच्छेद 370: 5 अगस्त 2019 को केंद्र की बीजेपी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया था.मलिक ने दावा किया था कि इतने बड़े फ़ैसले की जानकारी उन्हें महज़ एक दिन पहले दी गई. उन्होंने बताया, “कुछ नहीं पता था, एक दिन पहले शाम को गृह मंत्री का फ़ोन आया कि सत्यपाल मैं एक चिट्ठी भेज रहा हूं, सुबह अपनी कमेटी से पास करा के 11 बजे से पहले भेज देना.”भ्रष्टाचार पर बात करते हुए उन्होंने कहा था कि जम्मू-कश्मीर और गोवा का राज्यपाल रहते हुए उन्होंने भ्रष्टाचार के मामलों को कई बार प्रधानमंत्री के सामने उठाया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई.सत्यपाल मलिक का कहना था कि प्रधानमंत्री के क़रीबी लोग उनके पास जम्मू-कश्मीर में दलाली का काम लेकर आए, जिसमें उन्हें 300 करोड़ रुपये का ऑफ़र दिया गया था. इस काम को करने से उन्होंने मना कर दिया.जून, 2022 में अग्निपथ योजना का विरोध: अग्निपथ योजना का विरोध करते हुए मलिक ने कहा था, “अग्निपथ योजना हमारी फ़ौजों को, जवानों को नीचा दिखाने का काम करेगी.”इमेज स्रोत, Getty Imagesइमेज कैप्शन, किसान आंदोलन (फाइल फोटो)विवादित बयानों से नाता22 अगस्त 2022- इस वक्त सत्यपाल मलिक मेघालय के राज्यपाल थे.बागपत के खेकड़ा में आयोजित किसान मजदूर सभा में उन्होंने कहा, “दिल्ली की सीमाओं पर 700 किसान मर गए थे. मुझे कुत्ते ने नहीं काटा था कि मैं गवर्नर होते हुए पंगा लूं, लेकिन जब 700 लोग मर गए तब भी दिल्ली से एक चिट्ठी संवेदना की कहीं नहीं गई.””देर से उनको बात समझ आई. फिर माफ़ी मांगकर तीनों क़ानून वापस लिए गए, लेकिन तबीयत में तब भी ईमानदारी नहीं थी.”जनवरी, 2022- “मैं किसानों के मामले में जब प्रधानमंत्री से मिलने गया तो मेरी पांच मिनट में लड़ाई हो गई. वो बहुत घमंड में थे. जब मैंने उनसे कहा कि हमारे पांच सौ लोग मर गए हैं.”जनवरी 2019- “जम्मू-कश्मीर भी देश के दूसरों राज्यों की तरह है. यहां कोई क़त्लेआम नहीं चल रहा है. जितनी मौतें कश्मीर में एक हफ्ते में होती है उतने मर्डर तो पटना में एक दिन में हो जाते हैं. कश्मीर में अब पत्थरबाज़ी और आतंकी संगठनों में लड़कों का शामिल होना बंद हो गया है.””यहां लड़के खुलेआम हथियार लेकर घूमते हैं और राज्य के पुलिसकर्मियों को मारते हैं. आप उन्हें क्यों मार रहे हैं. अगर मारना ही है तो उन्हें मारो जिन्होंने आपके देश और कश्मीर को लूटा है. क्या आपने ऐसे किसी शख़्स को मारा है?”मार्च, 2020- गवर्नर दारू पीता हैउत्तर प्रदेश में बागपत के दौरे पर एक जनसभा में उन्होंने कहा था, “गवर्नर का कोई काम नहीं होता. कश्मीर में जो गवर्नर होता है, वो दारू पीता है और गोल्फ़ खेलता है.”बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित



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