विश्व आध्यात्मिकता महोत्सव, हैदराबाद में उपराष्ट्रपति के संबोधन का मूलपाठ

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विश्व के सभी धर्मों और आस्थाओं के आध्यात्मिक नेतृत्व, विद्वानों और साधकों की इस सम्मानीय सभा को संबोधित करना वास्तव में सम्मान और प्रसन्नता के क्षण हैं।

यह आयोजन दुनिया के सबसे बड़े ध्यान केंद्र कान्हा शांति वनम में हो रहा है।

मुझे हार्दिक प्रसन्नता है कि केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय, श्री राम चंद्र मिशन और अन्य के साथ समन्वित रूप से आध्यात्मिकता के इस महाकुंभ का आयोजन कर रहा है।

 

श्री राम चंद्र मिशन एक आध्यात्मिक आंदोलन है जो “सहज मार्ग” या “हार्टफुलनेस मेडिटेशन” के अभ्यास पर केंद्रित है।

 

हमें एक आध्यात्मिक विश्वविद्यालय चाहिए। वह एक है और यहीं है। इसे केवल विधिवत पुनीत स्थल के रूप में चिन्हित किया जाना है।

 

कान्हा शांति वनम के शांत वातावरण में, हम खुद को शांति के सागर में डूबा हुआ पाते हैं, युगों-युगों से गूंजती आध्यात्मिकता की गूँज में आसक्त हैं।

 

“आंतरिक शांति से विश्व शांति” की थीम आज के वैश्विक परिवेश में संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए परिपूर्ण समसामयिक प्रासंगिकता रखती है।

 

बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, अन्यायपूर्ण और असमान विकास, धर्म या आस्था के आधार पर दमन, असहिष्णुता, भेदभाव और हिंसा के बढ़ने से विश्व परिदृश्य चिंता का विषय है। इस स्थिति में, हमारा भारत आशा की किरण है, ज्ञान की किरण है, मानवता का घर है।

 

हमारी सभ्यता का सदाचार सर्व धर्म समभाव के सिद्धांत पर केन्द्रित है। भारत सदियों से अनेकता में एकता को प्रतिबिंबित करने वाले सभी धर्मों और सभी आस्थाओं के समान संरक्षण और संवर्धन के सिद्धांत को दृढता से फलीभूत करते हुए बहुलवाद का गौरवशाली नेतृत्व कर रहा है।

 

हमारा भारत इस मामले में अनुकरणीय है कि हजारों वर्षों के हमारे ट्रैक रिकॉर्ड की बराबरी कोई अन्य देश नहीं कर सकता।

 

विविध धर्मों को अपनाने वाले बहुलवादी और लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में हमारे समृद्ध इतिहास ने अपनी आस्था के लिए प्रताड़ित जनों को शरण प्रदान की है। चाहे पारसी, बौद्ध, यहूदी या कोई अन्य मत हो, उन्होंने लगातार भारत में उत्पीड़न या भेदभाव रहित अभयारण्य पाया।

 

भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्षता, समानता और न्याय के मूल्यों को प्रति-स्थापित करता है। सीएए के माध्यम से अभी क्रियान्वित किये गये कार्यों का उद्देश्य किसी भी नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन किए बिना प्रताड़ित धार्मिक अल्पसंख्यकों को राहत प्रदान करना है।

 

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ लोग पड़ोसी देशों में प्रताड़ित अल्पसंख्यकों पर मानवाधिकार के दृष्टिकोण से ऐतिहासिक संदर्भ और सुखद प्रभाव को पहचानने में विफल रहे।

 

यह आध्यात्मिक महोत्सव एक समागम से कहीं अधिक है; यह सार्वभौमिक मूल्यों का अभिनंदन और उत्सव दोनों है जो सीमाओं और सांस्कृतिक विविधताओं से निकलते हुए मानवता को एक साथ जोड़ते हैं।

 

भारत, मानवता का ऐसा घर जहां विश्व की आबादी का 1/6 भाग निवास करता है और यह देश स्पष्ट रूप से वैश्विक आध्यात्मिक केंद्र है। हमारा भारत आध्यात्मिकता के प्रति गहन प्रतिबद्धता से प्रेरित विश्व उपदेश को परिभाषित कर रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने बातचीत और कूटनीति के माध्यम से संघर्षों का समाधान करने का आह्वान किया, न कि गहन रूप से अंतर्निहित आध्यात्मिक लोकाचार से उत्पन्न युद्ध का।

 

शासन के लिए इससे अधिक हानिकारक और आधारभूत मूल्यों के विपरीत कुछ भी नहीं हो सकता है, विभिन्न मंचों से लोग निर्देशात्मक और चुनौतीपूर्ण प्रवचन में लगे हों। यह उनकी विचारधारा में आध्यात्मिकता की अनुपस्थिति को प्रतिबिंबित करता है।

 

यदि सत्तासीन लोग सत्ता के स्वामित्व की जगह सत्ता का ट्रस्टी, सेवा और सहानुभूति का केंद्र बनाने में विश्वास रखते हैं तो दुनिया जलवायु परिवर्तन और इस तरह की अस्तित्वगत चुनौतियों से निपटने के लिए सुखद स्थिति में होगी। यह तभी संभव है जब ये पदाधिकारी अपनी अंतर्निहित आध्यात्मिक शक्ति की खोज करने के लिए प्रतिबद्ध हों। इस सम्मेलन से उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होगी।

 

विशिष्ट श्रोतागण- आत्मा ही परम सार है, जो शरीर, मन, हृदय और आत्मा से बहुत परे है। अध्यात्म मानव जीवन की परम औदात्य और सद्गुण को परिभाषित करता है।

 

आध्यात्मिकता प्रेम, करुणा, धैर्य, सहनशीलता, क्षमा और जिम्मेदारी की भावना को समाहित करती है।

 

आध्यात्मिकता शरीर, मन, हृदय और आत्मा के साथ उत्कृष्ट समन्वय लेकर आती है। हमे अंतर्निहित आध्यात्मिकता को जागृत करने की आवश्यकता है।

 

आध्यात्मिकता किसी विशेष आस्था या परंपरा की सीमाओं तक सीमित नहीं है। यह एक सार्वभौमिक मार्ग है जो हमें अपने आंतरिक अस्तित्व की गहराई का पता लगाने, अपनी वास्तविक प्रकृति का एहसास करने और हम में से प्रत्येक में अंतर्निहित दिव्यता को जानने के लिए प्रेरित करता है।

 

भारत की संरचना की जड़ो में गहनता से समाया हुआ अध्यात्म एक मार्गदर्शक प्रकाश है जो हमारे जीवन के पथ को प्रकाशित करता है।

 

हमारे पाँच हज़ार वर्षों के सभ्यतागत सदाचार में निमित मात्र भी संदेह नहीं है कि इतिहास का घटनाक्रम आध्यात्मिक विचारों से प्रभावित था।

 

हमारा धर्म, नैतिकता, दर्शन, साहित्य, कला, वास्तुकला, नृत्य, संगीत और यहां तक कि हमारी राजनीति और सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था लगातार आध्यात्मिकता की प्रेरक शक्ति से प्रभावित और बनी हुई है।

 

जीवन के प्रति यह समग्र दृष्टिकोण हमारी संस्कृति को अनूठा बनाता है, भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक कल्याण और प्रकृति के साथ भी, सामंजस्यपूर्ण संतुलन को बढ़ावा देता है और यह स्थान इसका एक गौरवशाली उदाहरण है।

 

हमारे उपनिषद, वेद और अन्य धर्मग्रंथ अस्तित्व की प्रकृति, जीवन के उद्देश्य और सभी के अंतर्संबंध के बारे में गहन अंतर्दृष्टि प्रस्तुत करते हैं।

 

कुछ चित्रों के माध्यम से जो कुछ देखा, उसे संक्षेप में प्रस्तुत करने का मुझे परम सौभाग्य प्राप्त हुआ, हमारा 5000 वर्षों का सांस्कृतिक इतिहास उजागर हुआ।

 

मैं आप सभी से उस क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह करता हूं और आपको यह जानकर खुशी होगी कि हमारे संविधान में लघुचित्र हमारी 5000 साल की समृद्ध विरासत और हमारी बहुत समृद्ध सभ्यता के सदाचार को भी दर्शाते हैं।

मित्रों, जैसे-जैसे हम अपनी आध्यात्मिक विरासत के दार्शनिक महासागर में डुबकी लगाते हैं, हमें “धर्म” की अवधारणा से जुड़ते है, जो एक मार्गदर्शक सिद्धांत है जो जीवन में धार्मिक मार्ग को रेखांकित करता है, नैतिक आचरण और सामंजस्यपूर्ण जीवन के लिए दिशा-निर्देश देता है।

 

साहित्यिक क्षेत्र में, रामायण और महाभारत जैसे हमारे महाकाव्य आध्यात्मिक ज्ञान के कालातीत भंडार के रूप में कार्य करते हैं।

 

भगवद गीता में, भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच एक पवित्र संवाद, जीवन की प्रकृति, कर्तव्य और आत्म-प्राप्ति के मार्ग पर गहन अंतर्दृष्टि का दिव्यालोकन कराता है। यह सदैव प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है, हमें दृढ़ भावना के साथ जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए साहस प्रदान करता है।

 

यद्यपि हमारे मंदिरों और स्मारकों के वास्तुशिल्प चमत्कार भी आध्यात्मिकता और शिल्प कौशल के सहज संलयन के प्रमाण के रूप में विद्यमान हैं। ये पवित्र स्थल न केवल पूजा स्थलों के रूप में कार्यकरते हैं, बल्कि दिव्यता के प्रवेशमार्ग के रूप में, हमें भौतिक ब्रह्मांड से परे एक पारलौकिक (गहरे/ईथरल) संबंध का अनुभव प्राप्त करने के लिए आमंत्रित करते हैं।

 

भारतीय नृत्य शैलियाँ केवल नृत्य प्रदर्शन नहीं बल्कि आध्यात्मिक कहानियों और दैवीय अभिव्यक्तियों का अवतरण हैं। जटिल मुद्राएँ और अभिव्यंजक गतिविधियाँ आध्यात्मिक आख्यानों की सूक्ष्म बारीकियों को व्यक्त करती हैं, जिससे कलाकार, दर्शकों और परमात्मा के बीच एक पवित्र संवाद का सृजन होता है।

 

सज्जनों, हमारा शास्त्रीय संगीत, अपने जटिल राग और ताल रागों और तालों के साथ, आध्यात्मिक प्रगति के लिए एक शक्तिशाली माध्यम के रूप में कार्य करता है। वे हमें एक ऐसी यात्रा पर ले जाते हैं जहां स्वयं और परमात्मा के बीच की दूरियाँ शीघ्र ही मिट जाती हैं। संगीत एक ध्यान यात्रा बन जाता है, यह हमें हमारे आध्यात्मिक अस्तित्व के तत्व तक ले जाता है।

 

शासन और सामाजिक संगठन के क्षेत्र में, आध्यात्मिकता के सिद्धांत हमें एक न्यायपूर्ण और न्यायसंगत समाज की ओर अग्रसर करते हैं।

 

यदि हम इस भूमि पर हजारों वर्षों के शासनकाल को देखें तो आप पाएंगे कि शासक के सचेत रक्षक के रूप में एक ऋषि थे और यही आध्यात्मिकता का प्रतिबिंब है।

 

“राज धर्म” की अवधारणा शासकों के कर्तव्य पर जोर देती है कि वे न्याय और करुणा के साथ शासन करें, अन्य सभी विचारों पर अपने विषयों के कल्याण को प्राथमिकता दें। ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जब आध्यात्मिक विचार शासक के विवेक के रक्षक बने रहे।

 

किसी भी प्रकार के शासन में, चाहे लोकतंत्र हो या अन्यथा, बड़े समूह के साथ जुड़कर समीचीन परिस्थितियों का सामना करने की अदम्य इच्छा होती है, कभी-कभी दूसरे दृष्टिकोण को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया जाता है। ऐसी स्थिति में, आध्यात्मिकता से प्रेरित दृष्टिकोण विभिन्नाओं का ध्यान रखते हुए विषयों को समान रूप से संबोधित कर सकता है और सभी विचारों के विषयों को समान रूप से संबोधित कर सकता है। इसका उदाहरण आज के शासन से मिलता है और यही कारण है कि हम शासन के लाभों को बिना किसी भेदभाव के सभी के लाभ के लिए देखते हैं।

 

आध्यात्मिक आंदोलनों ने जीवन की जटिलताओं के माध्यम से मानवता को मार्गदर्शन दिया है। भक्ति आंदोलन भक्त और भगवान के बीच संबंध पर केंद्रित था। अन्य मान्यताओं और पूजा पद्धतियों में आंतरिक आध्यात्मिकता की धारणा थी। हम सभी मीराबाई जैसे भक्ति मार्ग के संतों से परिचित हैं।

 

हमने अपने स्वतंत्रता आंदोलन के समय असाधारण क्षमतावान व्यक्तित्वों के आध्यात्मिक नेतृत्व का उदीयमान देखा। स्वामी विवेकानन्द, राजा राममोहन राय और श्री अरबिंदो सहित अन्य प्रतिभूतियों ने उस समय के आध्यात्मिक और दार्शनिक परिदृश्य को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दूरदर्शी नेतृत्व ने आध्यात्मिकता और स्वतंत्रता, न्याय और समाज के कल्याण की खोज के बीच आंतरिक संबंध को जाना।

 

स्वामी विवेकानन्द ने विश्व को भारत के आध्यात्मिक ज्ञान से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने आध्यात्मिक सत्य की सार्वभौमिकता पर बल दिया, ईश्वरीय ज्ञान के विविध मार्गों की स्वीकृति और सम्मान की वकालत की। 27 सितंबर, 1893 को धर्म संसद में उनका ऐतिहासिक शिकागो भाषण, जिसमें संपूर्ण विश्व समुदाय से कट्टरता, उत्पीड़न और अधर्मी भावनाओं को समाप्त करने का आह्वान किया गया था, और “मदद करें और लड़ाई नहीं”, “आत्मसात करें और विनाश नहीं” की अपील की गई थी।”, “सद्भाव और शांति, असहमति नहीं” हमारे समय की आवश्यकता है, ऐसी पहले कभी नहीं थी।

 

मित्रों, स्वामी विवेकानन्द जी की शिक्षाएं हमारी आध्यात्मिक समृद्ध विरासत से मेल खाती हैं, जो हमें अंर्तमन में देखने, आंतरिक शांति की तलाश करने और अपनी आत्मा की असीम क्षमता का एहसास करने के लिए प्रेरित करती हैं।

 

आर्थिक गतिविधियाँ भी भारत के आध्यात्मिक सदाचार में अपनी जड़ों का वास पाती हैं। पुरुषार्थ या जीवन लक्ष्यों में से एक, “अर्थ” का सिद्धांत, धर्मपरायणता की सीमाओं में धन और समृद्धि की खोज की पुरजोर वकालत करता है।

 

इस धरती पर प्रत्येक व्यक्ति को यह जानना होगा कि वह यहां एक ट्रस्टी के रूप में आया है, वह अनुचित उपभोग में संलिप्त नहीं हो सकता है, वह इस तरह से कार्य नहीं कर सकता है कि मैं संसाधनों का उपयोग करूंगा क्योंकि मैं वित्तीय भार ग्रहण कर सकता हूं हमें संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करना होगा जो एक प्रकार से आध्यात्मिकता का प्रतिरूप है।

 

यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि भारत इन वर्षों में वैश्विक समुदाय के लिए अपने सभ्यतागत तत्व को प्रस्तुत करने में अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहा है। हमने बहुत लंबे समय तक इंतजार किया लेकिन अब दुनिया हमारी सभ्यतागत सदाचार की गहनता और आध्यात्मिक समृद्धि को जान चुकी है।

 

कोविड महामारी के समय जब 1.4 अरब लोगों का देश अपनी आबादी को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा था, हमने बहुत सफलतापूर्वक इस स्थिति का सामना किया, लेकिन उल्लेखनीय बात यह है कि हमारा भारत 100 अन्य देशों को कोवैक्सीन की मदद देकर उनके बचाव में समाने आया, क्योंकि हम वसुधैव कुटुंबकम की भावना के आधार पर कार्य करते हैं।

 

हमारी धरती पर हजारों वर्षों से पोषित यह अवधारणा भारत की जी20 अध्यक्षता के आदर्श वाक्य- ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ के साथ दुनिया के समक्ष आई और पोषित हुई ।

योग का उल्लेख अथर्ववेद में किया गया है और यह दुनिया के हर कोने तक पहुंच गया है। संयुक्त राष्ट्र में प्रधानमंत्री के प्रयासों का धन्यवाद, जिसके आधार पर 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में घोषित किया गया।

 

यह स्थल, जहां हम यह महत्वपूर्ण सम्मेलन का आयोजन कर रहे हैं, योग और ध्यान के लिए भी एक उत्कृष्ट स्थान है।

चिकित्सा विज्ञान, यद्यपि कितना भी विकसित हो तथापि अशांत विचार और उद्विग्न भावनाओं का समाधान नहीं करता है। जहां चिकित्सा विज्ञान विफल हो जाता है, वहां आध्यात्मिकता आशा और कायाकल्प का मार्ग दिखाती है।

 

हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहां कुछ लोग मानवीय मूल्यों की कीमत पर अंधाधुंध धन इकट्ठा करने, प्रतिष्ठा बनाने में लगे हुए हैं। उनका रुख समाज में असमानताएं पैदा करता है। अध्यात्म हमें मानव व्यवहार में सद्गुण, प्राकृतिक संसाधनों के उपभोग में मितव्ययता और सभी जीवित प्राणियों के प्रति सहानुभूति का मार्ग प्रशस्त करता है।

 

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सही ही कहा था कि पृथ्वी पर सभी की आवश्यकतानुसार पर्याप्त साधन हैं, लेकिन हर किसी के लालच के लिए नहीं। आध्यात्मिकता इस मानवीय लालच का एक प्रभावशाली प्रतिकार है।

प्रौद्योगिकी तकनीकी प्रगति को देखते हुए, हम विघटनकारी युग में रह रहे हैं। तकनीक हमसे आगे निकल रही है। हमें अभी इन प्रौद्योगिकियों के साथ सामन्जस्य बिठाना हैं। हमारी आध्यात्मिक विरासत का कालातीत ज्ञान एक मार्गदर्शक प्रकाश के रूप में कार्य करता है, जो हमें भौतिक सफलता की क्षणिक प्रकृति और आंतरिक शांति और आत्म-प्राप्ति के स्थायी महत्व की याद दिलाता है।

 

विभाजित दुनिया में, हमारे पास ऐसी संरचनाएं हैं जो मानवता को चुनौती दे रही हैं। आपूर्ति परिवर्तन में व्यवधान आया है जिससे भूखमरी हो सकती है। विश्व चिंताजनक स्थिति में है। आपको एकीकृत तत्व कहां से मिलता है और मैं कहता हूं कि आध्यात्मिकता एक एकीकृत बंधन उत्पन्न कर सकती है जो इस पृथ्वी पर शांति, सद्भाव और स्थिरता को सुरक्षित रखेगी। शांति और सद्भाव की इतनी आवश्यकता पहले कभी महसूस नहीं की गई।

 

ऐसी विभाजित दुनिया में शांति को इंसानों से खतरा है। वे खतरे में डालने वाले टुकड़े हैं। उन्होंने गलत निर्देशों का सहारा लिया है। कुछ लोग पृथ्वी के लिए समस्या पैदा कर रहे हैं। हमें आत्मज्ञान कैसे प्राप्त होता है? सुरंग के अंत में एकमात्र मार्ग, एकमात्र प्रकाश आध्यात्मिकता का प्रकाश है और हम इसमें शामिल होने के लिए लोगों को शामिल करने के लिए सही समय पर मिल रहे हैं।

 

आध्यात्मिकता न केवल व्यक्ति के लिए, बल्कि संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के लिए मानव क्षमताओं के अनुकूलन में मदद करती है।

 

प्रथम दृष्टया, और यह मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि ज्यादातर लोग सोचते हैं कि मैं आध्यात्मिक कैसे हो सकता हूं? यह एक अमूर्त विचार हैआप अच्छी बातें कहते हैं। मैं इन चीजों को व्यावहारिक विचारों में कैसे परिवर्तित करूं? आपके यहां बहुत योग्य संत हैं, लेकिन एक आम आदमी के रूप में मैंने उम्र, अपने कार्यों और व्यवसायों के कारण कुछ अनुभव जुटाए हैं। मैं आपको बता सकता हूं कि इसमें बाधा न बनें कि आध्यात्मिकता एक अमूर्त विचार है। यह बिल्कुल व्यावहारिक विचार है और यह साकार हो सकता है। आपको केवल अपने अंतर्मन देखना है। जिस क्षण आप अपने भीतर देखेंगे, आप पाएंगे कि आप अहसास के सही खांचे में होंगे और यह निर्बाध होगा।

 

जब मानव मन में ऐसे मुद्दे उठते हैं तो मानव मन अधीर हो जाता है, वह समाधान चाहता है। आज विश्व आध्यात्मिकता महोत्सव और कान्हा शांति वनम जैसे स्थानों जैसे समीकरणों पर ही व्यक्तियों को अभूतपूर्व ऊंचाइयों तक पहुंचने के लिए प्रबुद्ध, प्रेरित, प्रोत्साहित और सशक्त बनाया जा सकता है।

 

यह साध्य है। व्यक्ति के भीतर जो शक्ति है, उसे प्रज्वलित करने से ऐसे परिणाम मिलेंगे जो सकारात्मक होंगे और सकारात्मक योगदान से सभी को चकित कर देंगे।

 

आज दुनिया को सतत विकास और वैश्विक शांति का एक पारिस्थितिकी तंत्र बनाने के लिए मानव जाति की उत्साही भागीदारी की आवश्यकता है।

 

भारत आशा और संभावना की भूमि है। यह आध्यात्मिक विकास के लिए एक प्राकृतिक स्थान है। यह एक ऐसा स्थान है जहां व्यक्ति उदात्तता, सदाचार और सत्यता की खोज कर सकता है।

 

मैं और अधिक समय नहीं लेना चाहता। दुनिया के कुछ शीर्ष उपलब्धि हासिल करने वाले व्यक्तित्व जब निराशाजनक स्थिति में थे, निराशा की स्थिति में थे, उपलब्धि की संभावना से बहुत दूर थे, वे इस महान भूमि पर आए और अपने क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्वकारी बन गए। ये हमारा भारत है। हमारी भूमि आशा और संभावनाओं से परिपूर्ण है।

 

इस समय सकारात्मक सरकारों के कारण ऐसे कदम उठाए गए हैं जो प्रत्येक मानव आत्मा को सम्मान की भावना प्रदान करते हैं। जब ऐसा होता है तो आध्यात्मिकता पनपती है, आध्यात्मिकता तब उत्पन्न नहीं हो सकती जब आपके पास एक ऐसा शासन हो जहां कानून का कोई शासन नहीं है। जब आपके पास ऐसी व्यवस्था हो जो भ्रष्टाचार का अड्डा हो तो आध्यात्मिकता पनप नहीं सकती। हमारा नया आदर्श यह है कि भ्रष्टाचार को निष्प्रभावी कर दिया गया है। सकारात्मक शासन से हमारे पास अवसर हैं। हम सभी के लिए आध्यात्मिक मोड में आने का समय आ गया है।

 

यह वैश्विक शिखर सम्मेलन बहुत विशेष प्रासंगिकता रखता है। आध्यात्मिकता और आध्यात्मिक मस्तिष्क उन समस्याओं का समाधान ढूंढने में मदद करेंगे जो हमारे सामने खड़ी हैं।

 

विभाजित दुनिया में, हमारे पास ऐसी संरचनाएं हैं जो मानवता को चुनौती दे रही हैं। आपूर्ति परिवर्तन में व्यवधान आया है जिससे भूखमरी हो सकती है। विश्व चिंताजनक स्थिति में है। आपको एकीकृत तत्व कहां से मिलता है और मैं कहता हूं कि आध्यात्मिकता एक एकीकृत बंधन उत्पन्न कर सकती है जो इस पृथ्वी पर शांति, सद्भाव और स्थिरता को सुरक्षित रखेगी। शांति और सद्भाव की इतनी आवश्यकता पहले कभी महसूस नहीं की गई।

 

ऐसी विभाजित दुनिया में शांति को इंसानों से खतरा है। वे खतरे में डालने वाले टुकड़े हैं। उन्होंने गलत निर्देशों का सहारा लिया है। कुछ लोग पृथ्वी के लिए समस्या पैदा कर रहे हैं। हमें आत्मज्ञान कैसे प्राप्त होता है? सुरंग के अंत में एकमात्र मार्ग, एकमात्र प्रकाश आध्यात्मिकता का प्रकाश है और हम इसमें शामिल होने के लिए लोगों को शामिल करने के लिए सही समय पर मिल रहे हैं।

 

आध्यात्मिकता न केवल व्यक्ति के लिए, बल्कि संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के लिए मानव क्षमताओं के अनुकूलन में मदद करती है।

प्रथम दृष्टया, और यह मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि ज्यादातर लोग सोचते हैं कि मैं आध्यात्मिक कैसे हो सकता हूं? यह एक अमूर्त विचार हैआप अच्छी बातें कहते हैं। मैं इन चीजों को व्यावहारिक विचारों में कैसे परिवर्तित करूं? आपके यहां बहुत योग्य संत हैं, लेकिन एक आम आदमी के रूप में मैंने उम्र, अपने कार्यों और व्यवसायों के कारण कुछ अनुभव जुटाए हैं। मैं आपको बता सकता हूं कि इसमें बाधा न बनें कि आध्यात्मिकता एक अमूर्त विचार है। यह बिल्कुल व्यावहारिक विचार है और यह साकार हो सकता है। आपको केवल अपने अंतर्मन देखना है। जिस क्षण आप अपने भीतर देखेंगे, आप पाएंगे कि आप अहसास के सही खांचे में होंगे और यह निर्बाध होगा।

 

जब मानव मन में ऐसे मुद्दे उठते हैं तो मानव मन अधीर हो जाता है, वह समाधान चाहता है। आज विश्व आध्यात्मिकता महोत्सव और कान्हा शांति वनम जैसे स्थानों जैसे समीकरणों पर ही व्यक्तियों को अभूतपूर्व ऊंचाइयों तक पहुंचने के लिए प्रबुद्ध, प्रेरित, प्रोत्साहित और सशक्त बनाया जा सकता है।

 

यह साध्य है। व्यक्ति के भीतर जो शक्ति है, उसे प्रज्वलित करने से ऐसे परिणाम मिलेंगे जो सकारात्मक होंगे और सकारात्मक योगदान से सभी को चकित कर देंगे।

 

आज दुनिया को सतत विकास और वैश्विक शांति का एक पारिस्थितिकी तंत्र बनाने के लिए मानव जाति की उत्साही भागीदारी की आवश्यकता है।

 

भारत आशा और संभावना की भूमि है। यह आध्यात्मिक विकास के लिए एक प्राकृतिक स्थान है। यह एक ऐसा स्थान है जहां व्यक्ति उदात्तता, सदाचार और सत्यता की खोज कर सकता है।

 

मैं और अधिक समय नहीं लेना चाहता। दुनिया के कुछ शीर्ष उपलब्धि हासिल करने वाले व्यक्तित्व जब निराशाजनक स्थिति में थे, निराशा की स्थिति में थे, उपलब्धि की संभावना से बहुत दूर थे, वे इस महान भूमि पर आए और अपने क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्वकारी बन गए। ये हमारा भारत है। हमारी भूमि आशा और संभावनाओं से परिपूर्ण है।

 

इस समय सकारात्मक सरकारों के कारण ऐसे कदम उठाए गए हैं जो प्रत्येक मानव आत्मा को सम्मान की भावना प्रदान करते हैं। जब ऐसा होता है तो आध्यात्मिकता पनपती है, आध्यात्मिकता तब उत्पन्न नहीं हो सकती जब आपके पास एक ऐसा शासन हो जहां कानून का कोई शासन नहीं है। जब आपके पास ऐसी व्यवस्था हो जो भ्रष्टाचार का अड्डा हो तो आध्यात्मिकता पनप नहीं सकती। हमारा नया आदर्श यह है कि भ्रष्टाचार को निष्प्रभावी कर दिया गया है। सकारात्मक शासन से हमारे पास अवसर हैं। हम सभी के लिए आध्यात्मिक मोड में आने का समय आ गया है।

 

यह वैश्विक शिखर सम्मेलन बहुत विशेष प्रासंगिकता रखता है। आध्यात्मिकता और आध्यात्मिक मस्तिष्क उन समस्याओं का समाधान ढूंढने में मदद करेंगे जो हमारे सामने खड़ी हैं।

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