इमेज स्रोत, Getty Imagesइमेज कैप्शन, जानकारों के मुताबिक़, मोबाइल फ़ोन का अधिक इस्तेमाल हमें अकेलेपन की ओर ले जाता है (सांकेतिक तस्वीर)….मेंAuthor, राजवीर कौर गिलपदनाम, बीबीसी पंजाबी संवाददाता26 जुलाई 2025अगर आपका मोबाइल फ़ोन एकदम सही है और आपके पास समय भी है, लेकिन आप फ़ोन का इस्तेमाल न कर रहे हों, तो क्या होगा?शुरू में शायद समझ न आए कि क्या करें, लेकिन ऐसा मौक़ा मिले तो आपको अपने लिए समय निकालना चाहिए और उन कामों को पूरा करना चाहिए जिन्हें लंबे समय से टाला जा रहा हो. जैसे कोई किताब पढ़ना, अधूरी पेंटिंग पूरी करना या परिवार से बातें करना. इसे डिजिटल डिटॉक्स कहते हैं.डिजिटल डिटॉक्स इसलिए किया जाता है ताकि हम फिर से उन चीज़ों की अहमियत समझ सकें, जो कभी इंसानी ज़िंदगी और विकास का ज़रूरी हिस्सा थीं.वक्त के साथ हम डिजिटल उपकरणों पर इतना अधिक निर्भर हो गए हैं कि अब उन्हें दूर रखने के लिए भी ऐप्स की ज़रूरत पड़ रही है. यही वजह है कि अब डिजिटल डिटॉक्स ऐप्स की चर्चा होने लगी है. आइए जानते हैं कि ये ऐप्स कैसे काम करते हैं और डिजिटल डिटॉक्स के लिए हमें क्या करना चाहिए.डिजिटल डिटॉक्स ऐप्स क्या हैं?आईफ़ोन और एंड्रॉइड फ़ोन पर चलने वाले दर्जनों डिजिटल डिटॉक्स ऐप्स ऐप स्टोर में मौजूद हैं.ये ऐसे ख़ास ऐप होते हैं जो स्क्रीन टाइम कम करने और डिजिटल उपकरणों पर निर्भरता घटाने में मदद करते हैं. यानी इनका मकसद है आपको फ़ोन स्क्रीन से हटाकर असली ज़िंदगी से जोड़ना.गूगल प्ले स्टोर पर डिजिटल डिटॉक्स ऐप के बारे में लिखा गया है, “अपने फ़ोन से दोस्ती कम करें ताकि ख़ुद से, दूसरों से और दुनिया से दोबारा जुड़ सकें.”साथ ही लिखा है, “क्या आप हमेशा फ़ोन पर रहते हैं? क्या आपको दुनिया से कट जाने का डर है? क्या नेटवर्क न मिलने पर आप घबरा जाते हैं? ऐसा है, तो अब समय है डिटॉक्स का.” ये ऐप्स मूल रूप से एक तय समय के लिए फ़ोन को बंद कर देते हैं. यह समय 10 मिनट से लेकर 10 दिन, एक महीने या उससे भी ज़्यादा हो सकता है.फ़ोन कितने समय तक बंद रखना है, यह आप ख़ुद तय कर सकते हैं.इस दौरान सभी सोशल मीडिया ऐप्स बंद रहते हैं और सिर्फ़ इमरजेंसी कॉल की सुविधा मौजूद रहती है.कुछ ऐप्स फ़ोन कॉल की अनुमति देते हैं और कुछ कॉल पर भी समयसीमा तय कर देते हैं.हालांकि, डिजिटल डिटॉक्स ऐप चुनते समय सावधानी बरतना भी ज़रूरी है.डिजिटल डिटॉक्स ऐप कैसे काम करते हैं?इमेज स्रोत, Getty Imagesजैसा हमने बताया, ये ऐप्स तय समय के लिए आपके मोबाइल फ़ोन को बंद कर देते हैं. लेकिन कुछ ऐप्स आपको यह चुनने की सुविधा भी देते हैं कि कौन-सी सोशल मीडिया ऐप्स बंद करनी हैं और कौन-सी नहीं.मैंने ख़ुद इसका अनुभव किया है. छुट्टी के एक दिन मैंने सोचा कि क्यों न कुछ समय के लिए फ़ोन से ब्रेक लिया जाए. मैंने एक ऐप की मदद से लगभग तीन घंटे के लिए अपने फ़ोन को डिटॉक्स मोड पर डाल दिया.हालांकि आदत के मुताबिक़, इस दौरान मैंने एक-दो बार फ़ोन ज़रूर उठाया. इस दौरान स्क्रीन पर कुछ दिलचस्प मैसेज सलाह के तौर पर दिखे, जैसे -आप टहलने जा सकते हैं.आप अपना पसंदीदा खाना बना सकते हैं.परिवार के साथ बैठकर चाय पीते हुए आप समय बिता सकते हैं.आप बागवानी कर सकते हैं.ऐसे कई मैसेज स्क्रीन पर आते रहे, तो मैंने फ़ोन रख दिया. सच कहूं तो उस दिन ये तीन घंटे दिन के सबसे सार्थक घंटे साबित हुए. मन और दिमाग़ को थोड़ा आराम मिला और सुकून महसूस हुआ.असल में, डिजिटल डिटॉक्स ऐप्स फ़ोन का इस्तेमाल बेहद ज़रूरी काम तक के लिए ही सीमित कर देते हैं.डिजिटल डिटॉक्स की ज़रूरत क्यों है?इमेज स्रोत, Getty Imagesइमेज कैप्शन, विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि दिन में कुछ समय के लिए सभी तरह के डिजिटल उपकरणों से दूर रहना चाहिएअंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत में 86 फ़ीसदी वयस्कों के पास स्मार्टफ़ोन हैं और उनमें से 30 फ़ीसदी लोग रोज़ाना क़रीब छह घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं. चाहे दोस्तों से जुड़े रहने के लिए हों, या फिर सोशल मीडिया या मनोरंजन के लिए यूट्यूब या गेमिंग साइट्स.विशेषज्ञ इतने अधिक स्क्रीन टाइम को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए ख़तरनाक मानते हैं.फ़ैमिली साइकोलॉजिस्ट जसलीन गिल कहती हैं, “हम अपने परिवार के साथ अपने ही घर में रहकर भी ख़ुद को अलग-थलग कर चुके हैं.”वह कहती हैं, “इंसान का स्वभाव अकेले रहने का नहीं, बल्कि समाज में रहने का है. समाज की शुरुआत भी इंसान के साथ मिलकर रहने की प्रवृत्ति से हुई थी. बेकार का स्क्रीन टाइम हमें सीमित कर रहा है. हम अपनों से बात करने की बजाय फ़ोन पर समय बिताना ज्यादा पसंद करने लगे हैं.”जसलीन कहती हैं, “दिमाग़ से जुड़ी कई बीमारियाँ अकेलेपन से जुड़ी होती हैं. जब आप अपने दुख या परेशानियां किसी से साझा नहीं करते और ऐसे मामलों में मदद के लिए एआई जैसी चीज़ों पर निर्भर हो जाते हैं, तो स्थिति मानसिक बीमारी में बदल जाती है.”वह कहती हैं कि मनुष्य का विकास आपसी बातचीत, अनुभव और विचारों के आदान-प्रदान से जुड़ा है, जो अब बेहद कम हो गया है.जसलीन स्वस्थ मन और स्वस्थ शरीर का ज़िक्र करती हैं. वह कहती हैं, “मानव मस्तिष्क इतना शक्तिशाली है कि यह एक स्वस्थ व्यक्ति को बीमार कर सकता है. और अगर कोई बीमार है तो अपनी आत्म-शक्ति से वह स्वस्थ होने की दिशा में बढ़ सकता है.””लेकिन अगर अकेलापन लंबे समय तक बना रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब इंसान मानसिक बीमारियों के साथ-साथ शारीरिक बीमारियों का भी शिकार हो जाएंगे.”डिजिटल डिटॉक्स का अनुभवPlay video, “डिजिटल अरेस्ट क्या है और इससे कैसे बचें?”, अवधि 5,2205:22वीडियो कैप्शन, डिजिटल अरेस्ट क्या है और इससे कैसे बचें?स्कूल टीचर अमरजीत कौर जब इस साल जून में छुट्टियां बिता रही थीं, तो उन्हें एहसास हुआ कि सामान्य दिनों में स्कूल, बच्चों और उनके माता-पिता के इतने फ़ोन कॉल आते हैं कि वह अपने बच्चों के साथ अधिक समय नहीं बिता पातीं.उन्होंने सोचा कि छुट्टियों का पूरा समय वो अपने बच्चों के साथ बिताएंगी. उनका एक बच्चा छठी कक्षा में और दूसरा दसवीं कक्षा में पढ़ता है.लेकिन दो हफ़्ते बीत गए फिर भी वह बच्चों के साथ समय नहीं बिता सकीं, क्योंकि बच्चे मोबाइल फ़ोन में व्यस्त थे. अमरजीत ख़ुद भी दिन का ज़्यादातर समय कभी सोशल मीडिया पर, तो कभी किसी रिश्तेदार या दोस्त से फ़ोन पर बात करने में गुज़ार देती थीं.इसके बाद उन्होंने फ़ोन का इस्तेमाल कम करने की कोशिश की. वो कहती हैं कि यह मुश्किल काम था, क्योंकि बार-बार उनका ध्यान फ़ोन की ओर चला जाता था.अमरजीत कहती हैं, “भले ही कुछ ख़ास देखने की ज़रूरत न हो, फिर भी मैं हर थोड़ी देर में व्हाट्सऐप चेक करने लगती थी.”आख़िरकार, उन्होंने एक दोस्त की सलाह पर डिजिटल डिटॉक्स ऐप की मदद ली.वो कहती हैं, “मैंने कभी भी इस तरह के ऐप के बारे में नहीं सुना था. मैंने पहले दिन सिर्फ़ दो घंटे के लिए अपना फ़ोन बंद किया था. मैंने अपने बच्चों से भी ऐसा करने को कहा. वे मान गए.”अमरजीत कौर बताती हैं, “इसके बाद छुट्टियों के दौरान मैंने लगभग आठ घंटे तक फ़ोन बंद रखा. इससे मुझे अधिक समय मिला और मन को सुकून मिला. हमने बाकी छुट्टियां एक साथ बिताईं. मैंने अपने बच्चों के साथ समय बिताया और उन्हें बेहतर समझ पाई.”वो कहती हैं कि अब डिजिटल डिटॉक्स उनके जीवन का हिस्सा बन चुका है.इस मामले पर जसलीन गिल कहती हैं कि डिजिटल डिटॉक्स उन बच्चों के लिए और भी ज़रूरी हो जाता है, जो स्कूल और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं. जसलीन का कहना है, “स्क्रीन से दूरी बनाकर स्टूडेंट्स अधिक फ़ोकस कर सकते हैं. इससे वे टालमटोल से बच सकते हैं और मानसिक तनाव भी कम हो सकता है.”जसलीन कहती हैं कि फ़ोन के बिना हमारे कई ज़रूरी काम रुक सकते हैं, लेकिन हमें अपनी इंसानी आदतें और ज़रूरतें नहीं भूलनी चाहिए.बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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