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ब्लैकबोर्ड पर पैर से लिखकर गणित पढ़ाने वाले गुलशन लोहार की कहानी



इमेज स्रोत, Shannawaz Ahmedइमेज कैप्शन, गुलशन के संघर्ष की कहानी कई लोगों को प्रेरणा दे सकती है….मेंAuthor, मोहम्मद सरताज आलमपदनाम, पश्चिम सिंहभूम से, बीबीसी हिंदी के लिए28 अगस्त 2025जन्म से दोनों हाथ न होने के कारण गुलशन लोहार ब्लैकबोर्ड पर पैर से लिखकर हाई स्कूल के छात्रों को गणित पढ़ाते हैं.उनका स्कूल झारखंड के सबसे पिछड़े जिलों में से एक, पश्चिम सिंहभूम के ज़िला मुख्यालय से लगभग 90 किलोमीटर दूर बरांगा गांव में है.यह गांव सारंडा के जंगलों में स्थित है. इसी गांव में जन्मे गुलशन लोहार ने पढ़ाई-लिखाई से लेकर शिक्षक बनने तक लंबा संघर्ष किया है.गुलशन लोहार सात भाइयों में सबसे छोटे हैं. जन्म से ही दोनों हाथ न होने की वजह से उन्हें कई तरह की तकलीफ़ों का सामना करना पड़ा.बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करेंइमेज स्रोत, Shannawaz Ahmedइमेज कैप्शन, गुलशन इसी स्कूल में पच्चों को पढ़ाते हैंगुलशन लोहार के भाई छोटेलाल बताते हैं कि एक बार उनकी मां रायवरी ने उनसे कहा, “गुलशन अगर शिक्षित हो जाए तो उसे बेहतर जीवन की दिशा मिल सकती है.”इस पर छोटेलाल ने अपनी मां से पूछा, “गुलशन जब कलम नहीं पकड़ सकते तो पढ़ेंगे कैसे?”छोटेलाल कहते हैं, “तब मां ने कहा कि कलम पकड़ने के लिए हाथ नहीं हैं तो पैर को ही हाथ बना दूंगी.”माँ ने सिखाया पैर से पेंसिल पकड़नाइमेज स्रोत, Shannawaz Ahmedइमेज कैप्शन, प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल अभियान के तहत साल 2017 में गुलशन को सम्मानित किया गया थापरिवार वालों के मुताबिक़, जब गुलशन तीन साल के थे तभी से उनकी मां ने उन्हें सिखाना शुरू कर दिया.छोटेलाल लोहार बताते हैं, “मां एक चॉक को गुलशन के बाएं पैर के अंगूठे और दूसरी उंगली के बीच फंसाकर लकीर खींचने का अभ्यास करवाने लगीं.”कुछ दिनों बाद छोटेलाल ने चॉक की जगह पेंसिल गुलशन की उंगलियों में रखकर कॉपी पर लिखने का अभ्यास करवाना शुरू किया.डेढ़ साल में गुलशन का आत्मविश्वास इतना बढ़ा कि छोटेलाल ने उनका दाख़िला स्थानीय प्राइमरी स्कूल में करवा दिया.स्कूल के शुरुआती दिनों को याद करते हुए गुलशन कहते हैं, “उस वक़्त मुझे समझ आ गया था कि मैं दूसरे बच्चों की तरह सामान्य नहीं हूं. जहां सभी बच्चे हाथ से लिखते थे, वहीं मैं पैर से लिखता था. इससे मेरा मन बहुत दुखी हो जाता.”लेकिन उन हालात में बड़े भाई छोटेलाल ही गुलशन को हिम्मत देते और पढ़ाई के लिए प्रेरित करते.इन कोशिशों का नतीजा यह रहा कि पहली से दसवीं तक गुलशन स्कूल के टॉपर बने. उन्होंने साल 2003 में पैर से लिखकर हाई स्कूल की परीक्षा पास कर ली.हर दिन किया 74 किलोमीटर का सफ़रइमेज स्रोत, Shannawaz Ahmedइमेज कैप्शन, गुलशन ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए हर रोज़ 74 किलोमीटर का सफर कियापश्चिम सिंहभूम ज़िले के बरांगा गांव में, लगभग 50 परिवार रहते हैं. वहां हाई स्कूल के बाद आगे की पढ़ाई का कोई विकल्प नहीं था.ऐसे में गुलशन लोहार ने इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए चक्रधरपुर स्थित जवाहर लाल नेहरू कॉलेज में दाख़िला ले लिया.शुरुआती दिनों में जब गुलशन कॉलेज पहुंचते तो उन्हें देखने के लिए भीड़ इकट्ठा हो जाती.उन दिनों को याद करते हुए गुलशन कहते हैं, “मानो मैं कोई अजूबा था. उस दौरान छात्रों के बीच तरह-तरह की चर्चाएं होतीं कि बिना हाथ मैं कैसे लिख-पढ़ सकता हूं.”गुलशन हर दिन 74 किलोमीटर दूर स्थित चक्रधरपुर कॉलेज जाते थे. दिन में कक्षाएं करने के बाद शाम को वे घर लौट आते. इस दौरान वे रोज़ाना आठ किलोमीटर पैदल भी चलते थे.कड़ी मेहनत और लगन का नतीजा उन्हें साल 2005 में मिला, जब उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा 65% अंकों के साथ पास कर ली.तत्कालीन मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने दिया पढ़ाई का ख़र्चइमेज स्रोत, Shannawaz Ahmedइमेज कैप्शन, गुलशन के भाई छोटेलाल लोहार मदद की अपील के लिए गुलशन को झारखंड के पूर्व सीएम शिबू सोरेन से मिलाने ले गए थेगुलशन ने जवाहर लाल नेहरू कॉलेज से बीएड करने का मन बनाया था, लेकिन उनके सामने चौबीस हज़ार रुपये की फीस जुटाने की बड़ी चुनौती थी.छोटेलाल लोहार कहते हैं, “फीस की व्यवस्था हमारे बस की बात नहीं थी. ऐसे में गुलशन ने मुख्यमंत्री से मिलने की ज़िद की.”साल 2008 में छोटेलाल गुलशन को लेकर रांची पहुंचे, ताकि तत्कालीन मुख्यमंत्री शिबू सोरेन से मुलाकात कर सकें.उस दौरान उनकी कई रातें रेलवे स्टेशन पर गुज़रीं और दिन मुख्यमंत्री से मिलने की कोशिश में उनके आवास के बाहर बीते. कई दिनों की कोशिशों के बाद ही उनकी मुलाकात शिबू सोरेन से हो सकी.गुलशन के सर्टिफ़िकेट देखने के बाद मुख्यमंत्री शिबू सोरेन प्रभावित हो गए.गुलशन बताते हैं, “गुरुजी ने मुख्यमंत्री कोष से चौबीस हज़ार रुपये का चेक देते हुए कहा कि बाबू, पढ़ाई नहीं रुकनी चाहिए.”साल 2009 में बीएड पूरा करने के बाद भी गुलशन ने पढ़ाई जारी रखी और 2012 में राजनीति शास्त्र से पोस्टग्रेजुएशन कर लिया.ऐसे बने शिक्षकइमेज स्रोत, Shannawaz Ahmedइमेज कैप्शन, शिक्षिका सुनीता के मुताबिक़ बच्चे गुलशन सर के पढ़ाने के तरीके को काफ़ी पसंद करते हैंपोस्टग्रेजुएशन करने के बाद गुलशन ने झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी. साल 2013 की इस परीक्षा में वे मात्र एक अंक से मेरिट में शामिल नहीं हो सके.उस समय तक उनके सभी भाई, जो पेशे से मज़दूर थे, अपने-अपने परिवारों के साथ अलग रहने लगे थे. ऐसे में बढ़ती आर्थिक तंगी के बीच गुलशन पश्चिम सिंहभूम के ज़िला उपायुक्त से नौकरी मांगने पहुंच गए.तत्कालीन ज़िला उपायुक्त अबूबकर सिद्दीकी की पहल पर साल 2014 में स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) की सहायता से उनके पैतृक गांव बरांगा के उत्क्रमित उच्च विद्यालय में गुलशन को प्रति घंटे के मानदेय पर गणित शिक्षक के तौर पर नियुक्ति मिल गई.उत्क्रमित उच्च विद्यालय के प्रधानाचार्य राजीव प्रकाश महतो कहते हैं, “उस वक़्त हमारे स्कूल में गणित विषय का कोई अध्यापक नहीं था. ऐसे में गुलशन सर ने इस कमी को पूरा कर दिया.”प्रधानाचार्य के अनुसार, गणित विषय में शिक्षक न होने की वजह से पहले यहां के छात्र मुश्किल से फर्स्ट डिविज़न ला पाते थे. लेकिन गुलशन की कड़ी मेहनत ने छात्रों का परिणाम बेहतर बना दिया.वे कहते हैं, “प्रथम श्रेणी अंक प्राप्त करने वाले छात्रों की संख्या बढ़ गई, जिसका श्रेय गुलशन सर को जाता है. भले ही गुलशन सर गणित में स्नातक और पोस्टग्रेजुएट नहीं हैं, फिर भी वे 11 वर्षों से विद्यार्थियों को पूरी लगन के साथ गणित पढ़ा रहे हैं.”स्कूल की जीवविज्ञान शिक्षिका सुनीता कहती हैं, “गुलशन सर दिव्यांग हैं, लेकिन वे कभी भी किसी अन्य शिक्षक से कम नहीं लगे. बच्चे उनके बेहद क़रीब हैं. वे गणित को बहुत आसान तरीके से पढ़ाते हैं.”दसवीं की छात्रा नेहा महतो कहती हैं, “छठी कक्षा में जब मैंने यहां दाख़िला लिया तो देखा कि गुलशन सर पैर से लिखते हैं. तब मैं हैरान रह गई कि हाथ न होने के बावजूद वे पैर से लिखकर पढ़ाते हैं.”इमेज स्रोत, Shannawaz Ahmedइमेज कैप्शन, नेहा महतो ने बताया कि उन्हें गुलशन सर को देखकर शुरू में बहुत हैरानी हुई थीपांचवीं से दसवीं तक के छात्रों को गणित पढ़ाने वाले गुलशन लोहार से जब पूछा गया कि शिक्षक बनकर वे कितने संतुष्ट हैं, तो उनका जवाब था, “अपने गांव के स्कूल में सेवा करने का मौका मिलना मेरे लिए बड़े सम्मान की बात है.”मानदेय के बारे में पूछने पर वे बताते हैं, “मुझे प्रति घंटे पढ़ाने के 139 रुपये मिलते हैं, जिससे महीने में लगभग 13 से 14 हज़ार रुपये बन जाते हैं.”लेकिन स्थाई शिक्षक न होने की वजह से ‘नो वर्क, नो पे’ की शर्त लागू होती है. इस कारण जिस महीने छुट्टियां ज़्यादा होती हैं, उस महीने उनका मानदेय भी कम हो जाता है.गुलशन कहते हैं, “मैं लगातार शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की तैयारी कर रहा हूं ताकि झारखंड में शिक्षक की बहाली होने पर मैं स्थाई शिक्षक बन सकूं. तब मेरा वेतन बढ़ेगा और आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा.”गुलशन की पत्नी ने क्या बतायाइमेज स्रोत, Shannawaz Ahmedइमेज कैप्शन, गुलशन अपनी पत्नी अंजलि के साथघने जंगलों से घिरे बरांगा गांव में खपरैल की छत वाले घर में गुलशन लोहार का परिवार रहता है. परिवार में उनकी पत्नी अंजलि सोय और तीन साल की एक बेटी भी है.गुलशन कहते हैं, “बचपन से मां चिंतित होकर कहती थीं कि जब मैं ज़िंदा नहीं रहूंगी, तब गुलशन का ध्यान कौन रखेगा. अब अंजलि ने मेरे लिए बहुत बड़ा त्याग किया है. वह मेरे हर काम की ज़िम्मेदारी उठाती हैं.”अंजलि सोय बताती हैं, “सुबह उठने के बाद मैं उन्हें शौचालय ले जाती हूं, फिर ब्रश करवाती हूं. इसके बाद नहला कर कपड़े पहनाती हूं. नाश्ता कराने के बाद उन्हें स्कूल के लिए भेज देती हूं.”शादी के बारे में पूछने पर अंजलि मुस्कुराते हुए कहती हैं, “साल 2017 में हमने लव मैरिज की थी.”अंजलि आगे बताती हैं, “गुलशन मेरे लिए बहुत ख़ास हैं. उनकी वजह से मैं स्कूल टॉपर बनी. मेरी इंटरमीडिएट, स्नातक और अब पोस्टग्रेजुएशन तक की पढ़ाई गुलशन ने ही पूरी करवाई है.”गुलशन अपनी पत्नी अंजलि सोय को भी टीईटी की तैयारी करवा रहे हैं ताकि वे भी भविष्य में शिक्षक बन सकें.बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित



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