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बिहार एसआईआर: सुप्रीम कोर्ट में लगातार दूसरे दिन सुनवाई, वकीलों ने पूछा- चुनाव के बाद यह क्यों नहीं कर सकते



इमेज स्रोत, SHAHNAWAZ AHMAD/BBCइमेज कैप्शन, बिहार के वैशाली में अपना पहचान पत्र दिखाती एक वोटर (जुलाई, 2025)….मेंAuthor, उमंग पोद्दार पदनाम, बीबीसी संवाददाता 13 अगस्त 2025बिहार में स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (एसआईआर) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर लगातार दूसरे दिन सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस दौरान याचिकाकर्ताओं के वकीलों को सुना.वकीलों ने कहा कि कोर्ट को बिहार में चल रही एसआईआर प्रक्रिया पर रोक लगानी चाहिए. वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, “रिवीज़न के ख़िलाफ़ कोई नहीं है. इसे दिसंबर में करिए (जब चुनाव ख़त्म हो जाए).”उनका कहना था कि चुनाव आयोग को यह प्रक्रिया करने के लिए पर्याप्त समय देना चाहिए.सिंघवी की दलील थी कि 2003 में जब बिहार में इंटेंसिव रिवीज़न हुआ था, तो यह विधानसभा चुनाव से दो साल पहले और आम चुनाव से एक साल पहले किया गया था. उन्होंने कहा, “इन्होंने (चुनाव आयोग) कोई जवाब नहीं दिया कि चुनाव के बाद यह क्यों नहीं कर सकते.”वहीं, अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि अगर इस हफ़्ते चुनाव आयोग की दलीलें पूरी नहीं हो पाती हैं, तब भी अदालत को आयोग से कुछ अतिरिक्त दस्तावेज़ मंगाने चाहिए. इन दस्तावेज़ों में ड्राफ़्ट लिस्ट से बाहर किए गए 65 लाख लोगों की लिस्ट और उनके नाम हटाने के कारण, साथ ही उन लोगों के नाम शामिल हों जिन्हें बूथ लेवल ऑफ़िसर ने ड्राफ़्ट लिस्ट में शामिल करने या न करने की सिफ़ारिश की है. उन्होंने कहा कि मौजूदा ड्राफ़्ट लिस्ट, जिसमें लगभग 7.2 करोड़ वोटरों के नाम हैं, वह मशीन-रीडेबल फ़ॉर्मेट में अपलोड की जानी चाहिए.याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने आज भी यह दलील जारी रखी कि चुनाव आयोग की तरफ़ से अपनाई गई मौजूदा प्रक्रिया क़ानून के अनुरूप नहीं है.स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न करने के अधिकार पर बहसइमेज स्रोत, Santosh Kumar/Hindustan Times via Getty Imagesइमेज कैप्शन, पटना के ग्रामीण इलाक़े में अपना एन्यूमरेशन फ़ॉर्म दिखाते लोग (4 जुलाई 2025)आज की सुनवाई में एक अहम बहस इस बात पर हुई कि क्या चुनाव आयोग के पास स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (एसआईआर) करने का अधिकार है.जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन से कहा कि जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत चुनाव आयोग के पास “इलेक्टोरल रोल के स्पेशल रिवीज़न का निर्देश देने” का अधिकार है, और वह इसे “अपने अनुसार उचित तरीके से” कर सकता है. उन्होंने पूछा कि यह प्रावधान आयोग को एसआईआर करने में कुछ हद तक “छूट” दे सकता है.हालांकि, गोपाल शंकरनारायणन का कहना था कि यह प्रावधान आयोग को इस तरह का स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न करने का अधिकार नहीं देता. उनका कहना था कि आयोग ने जो तरीका अपनाया है, वह एक नई वोटर लिस्ट तैयार करने जैसा है, जबकि जस्टिस बागची जिन अधिकारों का हवाला दे रहे हैं, वे केवल कुछ विशेष परिस्थितियों और चुनिंदा निर्वाचन क्षेत्रों के लिए हैं.उन्होंने उदाहरण दिया कि भूस्खलन या भूकंप जैसी परिस्थितियों में आयोग अपने तरीके से वोटर लिस्ट का इंटेंसिव रिवीज़न कर सकता है. लेकिन मौजूदा एसआईआर में नई वोटर लिस्ट बनाने के लिए जो नियम और प्रक्रियाएं हैं, उनका पालन करना ज़रूरी था, जो इस मामले में नहीं किया गया.उन्होंने कहा, “इतिहास में पहली बार स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न किया जा रहा है. अगर इसे ऐसे ही होने दिया गया, तो पता नहीं यह कहां ख़त्म होगा.”दस्तावेज़ों की लिस्ट पर दलीलसुनवाई के दौरान पीठ ने एसआईआर के लिए तय की गई 11 दस्तावेज़ों की लिस्ट पर भी वकीलों से सवाल किए. अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि एसआईआर की प्रक्रिया में आधार को शामिल नहीं किया गया है, जबकि बिहार में ज़्यादातर लोगों के पास आधार होता है.जस्टिस बागची ने सिंघवी से कहा कि झारखंड में वोटरों के समरी रिवीज़न के लिए पहले सात दस्तावेज़ मान्य थे, जबकि एसआईआर के लिए यह संख्या 11 कर दी गई है. उन्होंने अभिषेक मनु सिंघवी से सवाल किया, “वे निवास साबित करने के लिए दस्तावेज़ों की संख्या बढ़ा रहे हैं. हम आपके आधार को लेकर दिए गए तर्क को समझते हैं. लेकिन समरी रिवीज़न की तुलना में दस्तावेज़ों की संख्या बढ़ाना वोटरों के हित में है.”हालांकि, सिंघवी का कहना था कि इन सात दस्तावेजों की लिस्ट में पानी और बिजली का बिल, आधार जैसे दस्तावेज़ शामिल थे, जो अधिक आसानी से उपलब्ध होते थे. लेकिन अब पासपोर्ट या जन्म प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज़ मांगे जा रहे हैं, जो उतने व्यापक रूप से उपलब्ध नहीं हैं. उन्होंने तर्क दिया कि केवल दस्तावेजों की संख्या बढ़ाने से यह नहीं कहा जा सकता कि ये वोटरों के हित में हैं.जब सिंघवी ने लोगों के पास दस्तावेज़ न होने पर ज़ोर दिया, तो जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “बिहार को ऐसी छवि में न दिखाएं.” उन्होंने बताया कि देश के कई आईएएस और आईएफएस अफ़सर बिहार से आते हैं.इस पर अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, “कई प्रतिभाशाली अफ़सर और वैज्ञानिक वहां से आते हैं, लेकिन यह एक वर्ग के लोगों तक सीमित है. राज्य में कई ऐसी जगहें भी हैं जहां बहुत ग़रीबी है और बाढ़ आती रहती है, जिनके पास दस्तावेज़ नहीं हैं.”नागरिकता मानने का आधारयाचिकाकर्ताओं के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के 1995 के एक फ़ैसले पर भी ज़ोर दिया. इस फ़ैसले में कहा गया था कि अगर किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट में है, तो यह मान लिया जाएगा कि वह भारत का नागरिक है. और अगर उसका नाम हटाना हो, तो इसके लिए तय प्रक्रिया का पालन करना ज़रूरी है. अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि चुनाव आयोग ने भी इस फ़ैसले का ज़िक्र अपने कई प्रकाशनों में किया है.उस मामले में 1.67 लाख लोगों के नाम वोटर लिस्ट में थे और उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने के लिए नोटिस भेजा गया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन नोटिसों को रद्द कर दिया. कोर्ट ने कहा था कि जब किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट में दर्ज किया गया है तो यह मानना होगा कि “नाम दर्ज करने से पहले संबंधित अधिकारी ने ज़रूरी प्रक्रिया पूरी की होगी और यह जांच की होगी कि वह व्यक्ति नागरिक है.”फ़ॉर्म भरने का मुद्दाप्रशांत भूषण ने दलील रखी, “किसी भी इंसान के लिए इतना बड़ा काम करना असंभव है…जिस तरह से वे यह प्रक्रिया कर रहे हैं, वह पूरी तरह मनमानी है और इसमें दुर्भावना नज़र आती है.”उनका कहना था कि पहले चुनाव आयोग ने वोटरों की ड्राफ़्ट लिस्ट ऐसे फ़ॉर्मेट में अपलोड की थी जिसे मशीन से पढ़ा जा सके. उन्होंने कहा, “लेकिन राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ़्रेंस के ठीक एक दिन बाद इसे बदलकर ऐसे फ़ॉर्मेट में अपलोड किया गया जिसे मशीन से पढ़ा नहीं जा सकता.”इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “हमें किसी प्रेस कॉन्फ़्रेंस के बारे में जानकारी नहीं है.”प्रशांत भूषण ने आगे बताया कि एन्यूमरेशन फ़ॉर्म वोटरों ने नहीं, बल्कि बूथ लेवल ऑफ़िसरों ने भरे हैं. उन्होंने कहा, “हमने वीडियो भी दिए हैं, जिनमें अधिकारी ईआर फ़ॉर्म भर रहे हैं और वोटरों की ओर से उन पर हस्ताक्षर कर रहे हैं. इसी वजह से बड़ी संख्या में मृत लोगों के नाम वोटर लिस्ट में शामिल हो गए हैं.”उन्होंने यह भी कहा, “एक पते पर 240 लोग दर्ज हैं.”इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की, “240 लोग एक घर में नहीं रह सकते.”अभिषेक मनु सिंघवी ने यह भी बताया कि 2004 में अरुणाचल प्रदेश और महाराष्ट्र में चुनाव के नज़दीक होने के कारण वोटर लिस्ट का रिवीज़न नहीं किया गया था.इमेज स्रोत, Shahnawaz ahmad/BBCइमेज कैप्शन, बिहार में एक बड़ी आबादी ऐसी है जिसने दस्तावेज़ के नाम पर आधार कार्ड जमा कराए हैं (फोटो: जुलाई, 2025)पश्चिम बंगाल में एसआईआरसुनवाई के दौरान गोपाल शंकरनारायणन ने कोर्ट का ध्यान इस ओर दिलाया कि पश्चिम बंगाल में भी इसी तरह की प्रक्रिया शुरू की जाने वाली है. उन्होंने कहा कि वह पश्चिम बंगाल राज्य की ओर से भी पेश हो रहे हैं. उनका कहना था, “पश्चिम बंगाल राज्य को भी 8 अगस्त को एसआईआर का नोटिस मिला है, वह भी राज्य सरकार से बिना परामर्श किए.”हालांकि, पीठ ने कहा कि इस मुद्दे पर बाद में विचार किया जाएगा, क्योंकि यह फिलहाल सामने आया मुख्य विवाद नहीं है.मामले में दलीलें गुरुवार को भी जारी रहेंगी. कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के बचे हुए वकीलों को अपनी दलीलें पूरी करने के लिए आधा घंटा दिया जाएगा, जिसके बाद चुनाव आयोग अपनी दलीलें पेश करेगा.बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित



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